Monday, 4 July 2016

नेहरु की नम्रता

धर्मवीर सुन्दर लाल

जवाहर लाल नेहरू इलाहाबाद में म्युनिसपैलिटी के चेयरमैन थे। उन्हीं दिनों की बात है मिर्जा अबुल फजला टैक्स सुपरिडेंट थे। म्युनिसपेलिस के कायदों के मुताबिक टैक्स जमा करने की आखिरी तारीख 31 मार्च होती थी। यदि 31 मार्च तक टैक्स नही जमा किया गया तो म्युनिसपैलिटी के वाटर वक्र्स के इंजीनियर नल के कनेक्षन काट देते थे। मिर्जा साहब ने देखा टैक्स न देने वालों की सूची में ऊंचे ऊंचे अफसर षहर के रईस और सभ्रान्त नागरिक होते थे पर उनमें से किसी के पानी का नल नही काटा जाता था। नल कटता था निम्न मध्यवर्ग के लोगों का और गरीबों का।
मिर्जा अबुल फजल ने जवाहर लाल नेहरू के सामने पेषकष रखी कि यह ठीक नहीं कि उसी अपराध पर गरीबों को ही सजा मिले और अमीर खुले छोड़ दिये जाय। जवाहर लाल नेहरू भी इस बात से पूर्ण सहमत थे कि यह अन्याय नही होना चाहिये।
दूसरे दिन अबुल फजल ने 51 आदमियों की पहली सूची चेयरमेन के सामने प्रस्तुत की और उन सबके नल काटने के आदेश दे दिये गये। उसके बाद इलाहाबाद के षहर में अभूतपूर्व हंगामा मच गया। जिनके नल काटे गये उन नागरिकों में इलाहाबाद हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस सर ग्रिमबुड वीयर्स का षीर्ष स्थान था, उसके नीचे सर तेज बहादुर का साथ कई रईस राय बहादुरों के नाम थे। स्वयं जवाहर लाल नेहरू के पिता पंडित मोतीलाल नेहरू का नाम था।
नेहरू जी जब घर आनन्द भवन पहुॅंचे तो पिता ने आड़े हाथों लिया कि पहले नोटिस भेजा जाना चाहिये था फिर नल काटा जाना चाहिये। जवाहर लाल नेहरू ने नम्रता से जबाव दिया ,‘यह एक उसूल की बात थी और तो कुछ मैने किया वही मुझे करना चाहिये था।

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