Saturday, 21 February 2026

brij ke bhajan

 98हरि ओम तत्सत हरि ओम तत्सत जपा कर जपाकर जपाकर जपाकर 

जो दुष्टों ने लोहे का खम्बा रचा था तो निर्दोष प्रहलाद क्यों कर बचा था

करी थी विनय एक स्वर से जो उसने हरि ओम....

लगी आग लंका में हलचल मचा था  तो घर फिर बिभीषण का क्यों कर बचा था

लिखा था यही नाम कुटिया में उसके हरि ओम तत्सत .............

कहो नाथ शबरी के घर कैसे आये    आये तो फिर बेर झूठे क्यों खाये

ह्नदय मे यही जिव्हा पर यही था हरि ओम तत्सत हरि ओम तत्सत 

हलाहल का प्याला मीरा ने पिया था कहो विष से अमृत कैसे हुआ था

दीवानी थी मीरा इसी नाम पर हरि ओम....

सभा में खड़ी द्रोपदी रो रही थी रो रो के आँसू से मुँह धो रही थी

पुकारा था दिल से यही नाम उसने हरि.....

हरि ओम में इतनी शक्ति भरी थी गरुड़ छोड़ धाये न देरी करी थी

बढ़ा चीर उसमें यही रंग रंगा था हरि ओम तत्सत हरि ओम तत्सत 

......................................................................................................................................................


99मेरो राम मिलन कैसे होय गली तो चारो बन्द पड़ी 

चार गली है चारांे बन्द है कौन गली से जाऊँ

एक तो चारो बन्द पड़ी मेरो राम 

पहली गली है दया धरम की दूजी गली है दान

तीजी गली है हरि सुमरन की चौॅथी में साधु सम्मान 

गली तो ...................

हरि सुमरन में मन नही लागे दान दिया न जाय 

दया धरम देखे डर लागे साधू का किया अपमान

गली तो चारो.........................

आग लगे डाका पड़े चोर मोर लै जाय 

यह अधर्म तो सहे जात है दान दिया न जाय 

गली तो चारो...................

चारो ही पन ऐसे ही बीते जैसे सूकर श्वान

जब जाओगे यम के द्वारे कहा बताओगे राम 

गली तो .................................

...........................................................................................

100धनुष धारी पर होजा मतवाला रे भज सीताराम

ठोकर खाई बहुत सी झूठ जगत व्यवहार

सीता पति मैं इसीलये आया तेरे द्वार

मुझे दर दर नही भटकना रे भज......

नृप दशरथ के महल में जनम लिया सरकार

कौशल पति प्रभु प्रगट भये तीन लोक करतार

खेलत चारो सुकमारा रे भज

फूल लेन बगिया गये  दशरथ राजकुमार

राम धनुष जब तोड़ दिया सिय डाली जयमाल 

जहाँ मिल गये चन्द्र चकोरा रे मज...................

सीय स्वयंवर में जुड़ी भीड़ भूप दरबार

राम धनुष जब तोड़ दिया सिय डाली जयमाला

युगल जोड़ी पर जाऊॅं बलिहारा रे मज ................

...........................................................................................

101

राजाराम ने पठ़ाये हनुमान जड़ी तो संजीवन की 

भरी सभा में बीड़ा डालो राम चन्द्र भगवान

इस बीड़ा को कोई नही झेले झेलेगें श्री हनुमान जड़ी सो ............................

उठे पवनसुत बैठ पवन सुत पहुँचे लंका जाय

खबर पड़ी राजा रखया कू पर्वत दियो है जलाय जड़ी तो संजीवन की 

ठाड़े हनुमत सोच करें हैं सोच करे मन मार

संजीवन तो कहूँ नही पाई पर्वत लियो है उठाय जड़ी तो संजीवन की 

उठे पवन सुत बैठ पवन सुत पहुँचे अयोध्या जाय

ताल वान गोदे में मारो राम ही राम पुकार जड़ी तो सजीवन की .............

कोनस के तुम पुतर कहियो कहा तुम्हारो नाम

कोन रजा की करो नौकरी कौन के लागा शक्तिवान जड़ी तो संजीवन ......................

अंजनी के हम पुत्तर कहिये हनुमान मेरो नाम 

राजा राम की करें नौकरी लक्ष्मण के लागा शक्तिवान जड़ी तो संजीवन की 

उठे पवन सुत बैठ पवन सुत पहुँचे लंका जाय 

संजीवन तो घोट पिलाई दई लक्ष्मण लिये है जिलाय जड़ी तो संजीवन की .............

तुलसी दास आस रघुवर की हरि चरणों चित लाय

जैसे कारज  राम के सारे वैसे ही मेरे भी सारो



......................................................................................................

102घर आयेगें श्री भगवान शिवरी के मन हरष भयो

वोले वचन मतंग ऋषि तू सुनि शिवरी मेरी बात 

एक दिना तेरे घर आयेगे लक्ष्मन और श्री राम 

शिवरी के मन हरष मयो..................

वचन सुने निश्चय कर मन में छोड़े गृह के काज 

बार बार घर भीतर आवे देखत लक्ष्मन राम

शिवरी के मन हरष भयो...................

चरण धोय चरणमृत लीन्हो आसन दियो विछाय 

कन्दमूल फल देनन लागी रूचि रूचि भोग लगाय

शिवरी के मन हरष भयो.............

शिवरी जैसी जात अधम की दीन्ही धाम पठाय 

श्याम कहे विश्वास रखे से घर बैठे प्रभु आय  

 शिवरी के मन हरष भयो................







...103.....................................................................................

राम दशरथ के घर जन्में घराना हो तो ऐसा हो 

लोग दर्शन को चले आवे सुहाना हो तो ऐसा हो 

यज्ञ का काम करने को मुनीश्वर ले गये वन में 

उड़ाये शीष दैत्यन के निशाना हो तो ऐसा हो 

तोड़ डाला धनष्ुा जाकर जनक की राजधानी में 

भूप सब मन में षरमाये लजाना हो तो ऐसा हो

पिता की मान कर आज्ञा राम वनवास चल दिये

न छोड़ा साथ सीता ने जनाना हो तो ऐसा हो

सिया को ले गया रावण बना कर वेष साधु का 

कराया नाश सब अपना ठिकाना हो तो ऐसा हो

प्रीति सुग्रीव से करके गिराया वाण से वाली ने

दिलायी स्त्री तब उसकी याराना हो तो ऐसा हो 

गया हनुमान सीता को खबर लेने को लंका में 

जला कर के नगर आया सताना हो तो ऐसा हो 

बाँध सेतु समन्दर में उतारा पार सेना को

मिटाया वंश रावण का हराना हो तो ऐसा हो 

राज्य देकर विभीषण को अयोध्या लोटकर आये

वो गंगा बालधर अपना दिखाना हो तो ऐसा हो 


104

रावण की सभा में विभीषण के उर लात लगाई भारी है

हा राम राम सुमरन करके चल दिया तुरन्त ब्रह्नचारी है

क्यों अब भी शेखी मार रहे लंका को जलाकर ताप रहे

एक बन्दर शान विगाड़ गया अब आई तुम्हारी वारी है।

है माई कहन मेरी मानो श्री राम से बैर न तुम ठानों

सीता को कर अर्पण प्रभु के लंकेश सलाह ये हमारी हैं

शिव सुनो विभीषण चल दिन्हा रामा दल के हनुमत चीन्हा

श्रीराम तरफ गये चरणा कमल चरणों में शीष दियो डारी

..........................................................................................................

105गुरू पास रहे या दूर रहे नजरों में समाये रहते हैं

इतना तो बता दे कोई हमें क्या कृपा इसी को कहते हैं

दुखियों की मंजिल लम्बी है जीवन की घड़िया थोड़ी है

इन दोनों को समझो एक समान गुरू अपना बनाये रहते हैं

जिस अंश के सारे अंशी है उस वंश के हम भी वंसी है

माया में फंस कर झूले हैं गुरू याद दिलाये रहते हैं।

..........................................................................................................

106घड़ी दो घड़ी राम गुन गाया करो

शील सनेह की दरिया विछाई

प्रेम का पंखा डुलाया करो 

घड़ी दो घड़ी......................

सत संगत की बैठक जोड़ी 

प्रेमी भक्त बुलाया करो

घड़ी दो घड़ी राम गुन गाया करो

चेारी बुराई और पर निन्दा 

कोई कहे समुझाया करो

घड़ी दो घड़ी राम गुन गाया करो

गंगा बाई कहे कर जोरी 

हरि के चरण चित लगाया करो 

घड़ी दो घड़ी राम गुन गाया करो☺

..................................................................


No comments:

Post a Comment

आपका कमेंट मुझे और लिखने के लिए प्रेरित करता है

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...