Wednesday, 20 January 2016

बचपन की सांस्कृतिक यात्रा

कम्प्यूटर पर रेस बाइक पर मोटर पर  और भी जाने कितने गेम खेल नही कहूगी क्योकि खेल के नाम पर हम हिन्दुस्तानी हो जाते हैं और आज कल बच्चों की दुनिया भारत को इंडिया के रूप मे जी रही है। पहले कम्प्यूटर पर फिर वास्तविक जगत मे द्रतुगति से वाहन भीड़ भरी सड़कों पर दौड़ाना उनका शौक है शान है जीवन है 

क्योकि बचपन ही उन्होंने कम्प्यूटर पर प्ले स्टेषन पर गेम खेल कर ही बिताया है। बचपन क्या होता है वे नही जानते हैं। परिवार है ही नहीं तो दादी नानी की कहानी कहाँ से सुनें। वे आया से चुपचाप सोने की कह या बैठे रहने की डांट सुन अकेले कमरे में स्टफ्ड खिलौनों को संगी साथी बनाकर तेजी से बडे होते हैं।



       तेजी से बडा होने से तात्पर्य है आजकल बच्चा अपने समय से कहीं ज्यादा मैच्येार है छोटे से दो साल के बच्चे के हाथ में मोबाइल का खिलौना होता है और पींठ पर ढेर सारी किताबें जो किताबी ज्ञान देती हं। यथार्थ की दुनिया से बहुत दूर कहीं दूर कल्पना की दुनिया उनको घेरे रहती है और कल्पना की दुनिया भी स्नेहिल कोमल परियों के पंखो के साथ तारा मंडल में घूमना तितली पकड़ना या फूलों से बात करते 


हुए बौनों की दुनिया में जाकर जादुई घोडे़ पर सबार होकर सात समुंदर पार जाना नही है। है हिंसक एलियंन्स के अजीब गरीब चेहरे और केवल मार धाड, दो ग्रहो के बीच युद्व या तरह तरह के जीवां का हमला सिर्फ हिंसा और हिंसा अकेलेपन और हिंसा के दृष्यो के बीच पलता बढ़ता बचपन कितना अलग है हमारे अपने बचपन से।


       आज की प्रौढ महिलाएं कहती हैं कि हमारी पीढी की बहुत मुष्किल है वे ऐसे समय  पैदा हुई है जब वे सास से दबाई गई जब वे बहू थी ,सास का वर्चस्व होता था और अब बहू से दबायी जा रही हैं क्योकि आज की बहु एक स्वतन्त्र इकाई है वह जो मन होता है करती है , अपने कार्यक्षेत्र मे या घर मं किसी का दखल पसंद नही करती और एक संतान होना मां बाप की मजबूरी है कि वे उसकी बात मानें क्योकि केवल और केवल उसका मॅुह देखकर जी रहे हैं। एक संतान होना बच्चो को अपने होने का एहसास  देता है और अपनी रियासत का। वहां अन्य किसी का दखल नही है वे है और केवल वे ही है।






       लेकिन बचपन के लिये हम अपने को सौभाग्यषाली मान सकते हैं। जो बचपन हमने जिया हैं। आज की पीढ़ी उस बचपन को छू भी नही सकती है। हमने ही उनके बचपन को बोझे से दबा दिया है किताबेां का बोझ उन्नति का बोझ सबसे आगे रहने का बोझ हरफन मौला बनाने का बोझ।


       पुस्तक किताबों से रिष्ता तो बचपन से ही था लेकिन कब अक्षर ज्ञान हुआ है नहीं याद है छोटे भाई की पटटी पूजा हुई वह याद है पाच साल का था छोटा भाई देवेन्द्र गणेष चतुर्थी के दिन उसके लिये विषेष धोती कुर्ता बना और जो पंडित जी हमें पढाते थे 

उन्हाने नई तख्ती से कलम से  छोटा लिखवाया। मिट्टी से सरस्वती माँ बनाई गई उन्हें श्वेत वस्त्र पहनाये गये और मिटटी से ही गणेष जी पधराये गये। एक विषेष लकडी का पटटा पूजा हेतु रहता था 


उसे ही यमुना जल से धोकर भगवान के आगे स्थापित किया जाता था। भगवान जी का अलग कमरा था वो कहलाता ही था भगवान जी का घर। छोटा सा आठ वाई आठ का कमरा होगा। हर कमरे मे आले दीवाले तो थे पूरे दरबाजे जैसी खिडकिया तीन फुट की ऊॅचाई पर लगी थी। वे खिड़किया माँ के पूजा करने के समय हमारे खेलने का प्रमुख स्थान थीं दीवारे घर की करीब डेढ फुट चैडी थी कभी किसी नबाब की हवेली थी जिस समय बाबूजी ने उसका आधुनिकी करण कराया मजदूर दीवारें तोडने में हांफ गये थे एक एक दीवाल कई कई दिन मे टूटी थी तब कुछ ही अंदर के कमरे बाबूजी ने ठीक कराये थे।



       प्रसंग था छोटे भाई के पटटी पूजन का सर्वप्रथम पंडित जी ने गणेष जी की मंत्रो के साथ पूजा कि फिर सरस्वती जी की उसके पष्चात् हल्दी केषर युक्त चंदन से चांदी की सिलाई से भाई की जीभ पर ऊॅ लिखा तथा तख्ती कलम की पूजा कर भाई का हाथ लगवाया फिर भाई का तिलक किया। इस प्रकार हम सबके साथ एक पढ़ने वाला बैठने लगा जो पढता लिखता कम था तख्ती को पोतता अधिक था।


हमें दो पंडित जी पढाने आते थे एक पंडित जी सुबह आते थे एक पंडित जी शाम को। सुबह बाले पंडित जी का नाम था पंडित प्यारे लाल भरे पूरे ष्षरीर और तोंद वाले पंडित जी धोती कुर्ता पहनते थे गरमी के दिनों में कुर्ते की जगह बिना बांह की कुर्ती सी पहनते गेहु्रआ रंग। पढने के कमरे में पंडित जी के आने के समय चटाई बिछ जाती। हम चार बच्चे पढते दो भाई मै और अब छोटा भाई ,बडी बहन कुछ ही  दिन पढी फिर शयद उनकी क्लास ऐसी हो गई थी जिसे वे नही पढा सकते थे। सुबह वाले पडित जी को कहा ही मोटे पंडित जी जाता था वे हमे हिंदी पढाते थे जैसे जैसे हम भाई बहन एक एक कर स्कूल जाने लगे पढ़ने बाले कम होते गये शाम को पंडित जी आते वे पतले दुबले थे। धोती कुर्ता तो वो भी पहनते मोटे पंडित जी गावतकिये को खिडकी के दरवाज पर लगा लेते थे 


खिडकी से ठंडी हवा आती और शीघ्र ही हमे लिखने के लिये दे वे झोंके लेने लगते और एक एक कर हम सब फुर्र धीरे धीरे पंडित जी को देखते हुए सरकते जाते। माँ सामने दूसरे कमरे में से देखती रहती वो आवाज लगाती ,‘‘पंडित जी’ ’और पेडितजी चैककर सीधे हो जाते और हमसब भी भोले भोले चेहरे बनाकर बैठतै पंडित जी मारते नही थे पर डंडी फटकरते ,‘कहां गये थेकिसी को प्यास लगी होती थी कोई एक ऊॅगली उठाता कोई दो उंगली और फिर अपनी अपनी तख्तियों पर झुक जाते।    

बचपन की सांस्कृतिक यात्रा भाग 2
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