Friday, 18 December 2015

जूता

भारत का राष्ट्रीय व्यंजन क्या है, यदि यह प्रश्न किया जाये तो इसका उत्तर आएगा आलू का पराठा और चैकिये मत । यदि किसी को भी  खाने का प्रलोभन दिया जाता है तो यही कहा जाता है ,‘आओ, आओ गरम गरम आलू के पराठे बनाए हैं, और आने वाला खाने का प्रलोभन छोड़ नहीं पाता । कोई फिल्म देखिये कोई सीरियल ,यदि खाने का प्रसंग होगा तो यही  होगा,‘ वाह आलूू का पराठा! मजा आ गया’ ,अब अगर कृष्णलीला लिखी जाएगी तो कृष्ण गोपियों के घर जाकर आलू का परांठा चुरायेंगे ।

नई रामायण में शबरी वन मैं जब गरम करारे आलू के पराठे खिलाएगी तो राम की आंखों में उसकी निष्ठा के प्रति स्नेह का दरिया स्वतः बहने लगेगा । बीबी को मिया को रिझाना है ,रिझाने से मतलब कोई काम निकलवाना है वह कहेगी, ‘आज आलू के पराठे बनाए हैं’। जैसे दुनिया का सबसे लजीज व्यंजन बनाया हो ,‘वाह! मजा आ गया ’ और उसकी लार टपक जाती है । मियां का पेट भरा है तो जहन्नुम मैं भी ले चलो ,पर ये ही पराठे दूसरे रूप में भी प्रचलित है

‘पराठे खाने हैं ?’ मतलब बेभाव के जूते खाने हैं । अगर गरमा गर्म ,तपा तपा कर किसी को लगाने हैं तो यह है पराठे रूपी जूता, जो आजकल सभाओं में खूब चलते हैं, और खाए भी खूब जाते हैं , चुराए भी जाते हैं । कुछ का तो खर्च भी इसी से चलता है । ये मंदिर के आगे या उठावनियों में, मुर्दनियों में गायब हुए जूतों के मालिको से पूछो। पहले कवि सम्मेलन में किसी कवि को उखाड़ना  होता था तब चलते थे ।


वैसे बहुत समय से जूतों की राजनीति चली आ रही है तभी तो भरत जी रामजी की चरण पादुका ले आये। जूता सिघासन पर, तब ही से जूते की राजनीति चली आ रही है । मानेगा बात कैसे नहीं मानेगा जूते के दम पर मानेगा । तेरी बात तो जूते की नोक पर है फिर दस नम्बरी हो तो बात ही क्या है किसी ने सच ही कहा है ,

बूट दसों ने बनाया, मैंने एक मजमून लिखा।मुल्क में मजमून न फैला, और जूता चल गया।

गढ़चिरौली में अजित पवार पर महिला ने चप्पल फेकी। बहुत दिन से जूते चप्पल का प्रसंग शांत था इसलिये बेचैनी हो रही थी । केवल टी वी में फीफा वल्र्ड कप के समय अवश्य लोग भागते दौड़ते जूतों को देखरहे थे चेहरे कम जूते ही जूते भागते थे । कितने प्रेम से लोग उन जूतों को देख रहे थे ।


हर उछलने वाले जूते पर वाह ! वाह! कर उठते थे सबके दिन फिरते है जूतों के भी फिरे हैं। जूते मंदिर में ही  उठाये जाते या शोक सभा में ,अब प्रकाश सिंह बादल की सभा में भी जूते बाहर ही उतरेंगे ,क्या बात हुई ? भैये कुछ गड़बड़ तो है । एकबार खन्ना गांव में उछला जूता तो बार बार पड़ने का डर लग गया क्या ? या कुछ और बात है बादल की सभा है पूरी बात कौन सुनता है । जूते बाहर उतरें । देखेंगें तो सोचेंगे आगे आप सोचो।



अब लो मुशर्रफ तो रिकाॅर्ड बनाने जा रहे है जूते खाने का। आधुनिक काल में यह अमेरिका के राष्ट्रपति से प्रारम्भ माना जाये और विश्व वीरता पदक प्रदान किया जाना चाहिए । जूता खाने से ज्यादा जूता चलाना मुश्किल है ।


जूता चप्पल टमाटर अंडे छुटभैये नेता ,गायक, सबसे ज्यादा कवि अपने प्रदर्शन से बटोरते रहे है । पर पहला जूता फ़ेकने का असली श्रेय उसी अमरीकी पत्रकार को जाता है जिसने बुश पर जूता फेंकने की बहादुरी की । उसके बाद तो जूता फेकना प्रचलन में आ गया जुगाड़ है

जिंदगीगरीबी की आड़ है जिंदगी
कर कर मर जाओमरना भी जुगाड़ है जिंदगी


आवश्यकता आविष्कार की जननी है ,

यह निश्चत है और आवष्किार का दूसरा नाम है जुगाड़ , जो आजकल सड़कों पर तो दौड़ ही रहा है  असल जिंदगी में भी दौड़ रहा है । यह भी किसी ने रोजी रोटी का जुगाड़ किया । किसी के पहिये किसी की बाॅडी और ठोक दिए तख्ते और चल दी सवारी भर कर गाड़ी ।


पिन भी तो जुगाड़ है । बटन टूट गया ,तार जोड़ कर फटे को सीने का जुगाड़ कर लिया हो गई व्यवस्था । ऐसे ही करते जाओ जुगाड़ । गरीब की जिंदगी तो जुगाड़ ही है। दो रोटी का जुगाड़ करने के लिए बच्चे हर चैराहे पर देवी देवता की तस्वीर रखकर अपने आकाओं की शराब और ऐश का जुगाड़ करते हैं । उन्हें तो धूप में ताप में गंदे कपड़े पहन कर बिना नहाए हुए पवित्र देवता की तस्वीर घुमानी है।

जूता: अगला भाग

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