मैंने स्पष्ट कहा, ‘मेरे पास इस समय तो पांच हजार फ्रेंक है नहीं, प्यारी बहन ’ । वह कुछ बुदबुदाई,‘ओह मैंने अनुरोध किया था , मेरा काम कर दो। मैं तुमसे भीख मांगती हूँ ,तुम्हें नहीं मालुम मैं किस कष्ट से गुजर रही हॅंू। मुझे आज ही पैसे चाहिये।’
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मुझे उस पर दया आई ,‘ठीक है तुम्हें कैसे न कैसे मिल जायेंगे ,मैं कसम खाता हूँ ।’
‘ओह! धन्यवाद’
जब वह चली गई तब मैं डॉक्टर के पास गया उसने मेरी बात सुनी और मुस्कराता रहा।
4 अगस्त , मेरे नौकरों में झगड़ा हो गया उन्होंने बताया कि रात अलमारी में रखे गिलास टूट गये। झाड़ पोंछ वाले ने रसोइये पर इल्जाम लगाया । उसने बर्तन धोने वाली पर इल्जाम लगाया । कौन अपराधी है? जो भी है चालाक है ,कौन बतायेगा ?
6 अगस्त , इस बार मैं पागल नहीं हूँ कोई शक नहीं मैंने उसे देखा।
मैं दोपहर तेज सूर्य की रोशनी में दो बजे अपने बगीचे में गुलाब की क्यारियों के बीच टहल रहा था । मैं जाइंट बैटिले को देखने के लिये रूक गया उस पर तीन बहुत सुंदर गुलाब खिले थे।एक गुलाब की डंडी मेरी ओर झुकी, जैसे किसी अदृश्य हाथ ने उसे झुकाया हो, फिर फूल सीधा हो गया। फिर फूल ने अपने को ऊँचा किया जैसे कोई अपने मुँह तक सूंघने के लिये ले गया हो, वह हवा में खड़ा रहा एक सुर्ख लाल बिंदु की तरह मुझसे तीन गज दूर । हताशा में मैं उसे लेने लपका। मुझे कुछ नहीं मिला वह गायब हो गया था । तब मैं अपने ही प्रति क्रोध से भर गया। मैं डंडी को देखने झुका और मुझे वह झाड़ी पर ताजा तोड़ा हुआ मिला और दो अपनी डंडियों पर थे। अब मुझे विश्वास हो गया था कि दिन और रात मेरे पास कोई अदृश्य आत्मा है जो दूध पानी पर रहती है । वह चीजों को छू सकती है उन्हें ले सकती है उनकी जगह बदल सकती है । वह प्रकृति से मालामाल है । यद्यपि वह हमारी इंद्रियों को नहीं दिखाई देती लेकिन वह है मेरी छत के नीचे रहती है।
7 अगस्त , मैं शांति से सोया । उसने मेरे जग से पानी पी लिया पर मुझे परेशान नहीं किया। मैंने पागलों को देखा है और बुद्धिमानों को भी देखा है । शांत और जीवन के हर पहलू को अच्छी नजर से देखने वाले ,एकाएक उनके दिमाग पर पागलपन का दौरा पड़ता है और टुकड़ों में बंट जाता है और विशाल भयानक समुद्र की लहरों में जहाँ मेढक है शार्क हैं उनमें उतराने लगता है जिसे पागलपन कहते हैं।
मैं इंद्रजाल में भ्रमित हो रहा हूँ । यही घटना चक्र स्वप्न में भी मायाजाल फैला देता है जिससे हमें कोई आश्चर्य नही होता, क्योंकि हमारे सोचने की शक्ति और नियत्रित करने की ताकत सो जाती है जबकि हमारी कल्पना शक्ति जाग्रत हो जाती है । क्या यह संभव नहीं है कि हमारा सूक्ष्मतंत्र मूर्धन्य मस्तिष्क पर हावी हो गया हो जिसने मुझे लकवाग्रस्त कर दिया हो।
8 अगस्त ,आज बड़ी भयानक शाम थी। वह मेरे आसपास है मुझे देख रहा है उसने अपने को छिपा रखा है अगर प्रकट होकर अपनी अलौकिक शक्ति दिखा देता वह अच्छा था।
13 अगस्त ,जब हम पर कोई रोग आक्रमण करता है तब हमारे अंदर की सभी इंद्रिया टूट सी जाती हैं,ै हमारी ऊर्जा नष्ट हो जाती है । हमारी मांसपेशियां शिथिल हो जाती हैं ।
14 अगस्त, किसी ने मेरी आत्मा पर अधिकार कर लिया है और उस पर उसका नियन्त्रण है। कोई मुझसे सब करवा रहा है मैं कुर्सी में गड़ गया हूँ और कुर्सी ने जमीन इतनी कसकर पकड़ ली है कि कोई शक्ति उसे नहीं हिला सकती।
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15 अगस्त, लगता है अंदर कोई प्रवेश कर गया है ,, दूसरी आत्मा जिसने नियत्रंण में ले लिया हो ,
6 अगस्त, किसी प्रकार मैं दो घंटे के लिये निकल लिया । एक कैंदी की तरह जिसे एकाएक अपनी कोठरी का दरवाजा खुला मिल गया हो। मैंने गाड़ीवान से घोड़े भगाने के लिये कहा, और मैं रोन पहुंच गया।
मैंने गाड़ी पुस्तकालय के निकट रूकवाई और डॉ॰ हरमन हैरेस्टस का प्राचीन और आधुनिक निवासियों पर शोध प्रबन्ध मांगा।
17 अगस्त , मैंने एक बजे सुबह तक किताब पढ़ी हैंरेस्टस दर्शनशास्त्र का विशेषज्ञ उसने उन अलौकिक शक्तियों के ऊपर लिखा था जो मनुष्य के चारों ओर घूमती रहती हैं। उसने उनकी उत्पत्ति उनका रहने का स्थान शक्ति, आदि पर विस्तार से लिखा था ,लेकिन जो मुझे पर हावी थी उसके विषय में कुछ नहीं था।
मैं सो गया, ठंडी रात में करीब तीन प्रहर बीत गये ,मैंने अपनी आंख खोली एक अजीब सी उलझन भरी सनसनाहट। पहले कुछ नहीं दिखा फिर लगा मेज पर रखी किताब का पन्ना पलटा । कमरे में हवा जरा भी नहीं आई थी ,दूसरा पन्ना जैसे किसी ने पलटा हो । मेरी कुर्सी खाली थी लेकिन मैं जानता था उस पर वह बैठा पढ़ रहा है। क्रोध से जानवरों की तरह मैं उसे पकड़ने झपटा । उसे मारने के लिये लेकिन कुर्सी पलट गई , कुर्सी मेज हिल गई लैंप गिर गया और बंद हो गया फिर खिड़की बंद हो गई जैसे कोई जाते जाते बंद कर गया हो।
19 अगस्त, मैं जानता हूँ मैंने रेव्यू डू मोन्डे साइन्टिफिक में पढ़ा है कि एक समाचार आया था पागलपन की महामारी का। यूरोप में मध्यकाल में सैन-पोलो मैं इसी प्रकार की बीमारी फैली थी । डरे हुए निवासी अपना घर छोड़ कर भागे थे । आह हम पर विपत्ति हैं वह आ गया है। मुझे अपना नाम चिल्ला कर बता रहा है , मैं सुन नहीं रहा हूँ । हाँ वह चिल्ला रहा है-मैं सुन रहा हूँ । वह दोहरा रहा है होरेला.. मैंने सुना होरला... वह आ गया है होरला।
ओह गिद्ध ने कबूतर खा लिया। भेड़िये ने मेमने को पकड़ लिया । शेर ने तीखे सींग वाले भैंसे को खा लिया। मनुष्य ने शेर को एक तीर से मार दिया, एक तलवार से बंदूक से । लेकिन होरला मनुष्य को वही बना देगा जो हमने बैल और घोड़े को बना दिया है पालित पशु ,अपना गुलाम, ,अपना भोजन केवल अपनी इच्छा शक्ति से।
हम हैं ब्रह्मांड में बहुत कम, हम और क्यों नहीं हैं? ? क्यों अन्य फूलों फलों वाले वृक्ष हैं । क्यों अग्नि हवा, पानी, मिट्टी के अलावा अन्य पदार्थ हैं। ये केवल चार तत्व हैं, केवल चार ही क्यों जो सब को पाल रहे हैं चालीस क्यों नहीं, चार सौ, चार हजार, सब कुछ कितना निरीह है, अनगढ़, जल्दीबाजी में बनाये गये। ओह हाथी और दरियाई घोड़े को देखो कितने भव्य और ऊँट कितने सौम्य लेकिन तितली एक उड़ता हुआ फूल मैं कल्पना करता हूँ इतनी बड़ी तितली दस संसारों के बराबर ,उसके पंखों की बनावट सुन्दरता रंग और पंखों का हिलना में बता भी नहीं सकता, मैं एक सितारे से दूसरे सितारे तक उड़ते देखता हूँ रोशनी से नहाते, उड़ते हुए संगीतमय सांसंे लेते और मनुष्य हर्षित उसे देखकर अत्यन्त सुख प्राप्त
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करता है।
होरला वह मुझे डरा रहा है वह मुझे इन बेकार बातों को सोचने को मजबूर कर रहा है। वह मेरे अंदर हैं वह मेरी आत्मा बन रहा है मुझे उसे मारना होगा।
29 अगस्त , मुझे उसे मारना है, मैंने उसे देखा है मेरे पीछे एक बहुत बड़ी कपड़ों की आलमारी थी जिसमें दर्पण था जिसके आगे प्रतिदिन में दाढ़ी बनाने के लिये और कपड़े पहनने के लिये खड़ा होता उसमेें सिर से पैर तक देखने की मेरी आदत हो गई थी। मैं उसे धोखा देने के लिये लिखने का बहाना कर रहा था। वह मुझे देख रहा था मैंने महसूस किया, निश्चय ही वह मेरे कंधे पर झुका पढ़ रहा था, मैं उठ खड़ा हुआ मेरे हाथ बढ़े और तेजी से घूमे चारों ओर दोपहर का सा उजाला था लेकिन मुझे दर्पण में अपना अक्स नहीं दिख रहा था । मैंने उस विशाल साफ आईने को ऊपर से नीचे देखा, वह फिर बच जायेगा क्योंकि उसके अदृश्य शरीर ने मेरा अक्स भी अपने अंदर समा लिया है।
मैं डर गया, तब एकाएक मैं दिखाई देने लगा, धुंधला जैसे पानी मेरे ऊपर से बह रहा है जो हरपल साफ होता जा रहा है,
30 अगस्त, मैं उसे कैसे मारूँ, जहर दे दॅूं लेकिन वह पानी में मिलाते देख लेगा और तब...और क्या हमारा जहर उस अगोचर जिस्म पर असर करेगा ं ?
31 अगस्त ,मैंने रोन से एक लुहार लोहे का दरवाजा बनवाने के लिये भेजा, मुझे लोग डरपोक कहेंगे 10 सितम्बर, कल लोहार ने लोहे का शटर और दरवाजा लगा दिया, मैंने सब कुछ आधी रात तक खुला छोड़ दिया यद्यपि ठंड हो रही थी।
एकाएक मुझे लगा वह है , मैं धीरे से उठा और कुछ देर ऊपर नीचे करता रहा जिससे उसे कोई शक न हो और फिर तेजी से मैंने शटर बंद कर दिया, एकाएक मुझे लगा वह बेचैन मेरे चारो ओर घूम रहा है ,अब वह डरा हुआ मुझसे कह रहा है कि मुझे बाहर जाने दे मैंने पीठ दरवाजे की ओर करके इतना खोला कि मैं ही बाहर निकल सकूं मैं इतना लंबा हूँ कि चौखट तक मेरी लंबाई है। मैंने उसे अकेला बंद कर दिया । फिर मैं नीचे उतरा अपने ड्राइंगरूम में गया जो मेरे सोने के कमरे के नीचे था। मैंने दो लैम्प लिये उनका सारा तेल कालीन पर और सोफे पर फैला दिया सब जगह और उसमें आग लगा कर मैं बाहर निकला और ताला लगा दिया। मैं बाहर बगीचों में छिप गया, झाड़ियों के झुंड में । निचली खिड़की पर लपट दिखाई दी, एक लम्बी लाल लपट सफेद दीवार पर दिखाई दी और छत तक बढ़ चली मुझे लगा जैसे दिन निकल रहा है ,तभी दो अन्य खिड़कियों से लपटें निकलने लगीं। मैने देखा मेरे घर का निचला हिस्सा लाल तपता भट्टी हो गया था लेकिन एक चीख डरावनी तीखी दिल-दहलाने वाली चीख । एक औरत के रोने की आवाज सन्नाटे में गूंज गई । दो दुछत्ती की खिड़कियां खुलीं ओह मैं नौकरों को तो भूल ही गया मैंने उनकेेे डरे हुए चेहरे देखे ,े।
फिर डरा हुआ मैं गांव की ओर भागा, ‘बचाओ बचाओ! आग! आग! मै कुछ लोगों से मिला जो वहीं आ रहे थे मैं उनके साथ लौटा।
तब तक घर एक जलती चिता में बदल चुका था एक विशाल चिता, जिसमें आदमी जल रहे थे और वह भी जल रहा था। वह वह मेरा कैदी नया मालिक, होरला।
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एकाएक सारी छत दीवारों के बीच गिर गई ओर एक आग का ज्वालामुखी आकाश की ओर उढ़ गया, आग की लहर झपटीँ वह उस भट्टी में था, मरा हुआ।मर गया ? शायद उसका शरीर, क्या उसका शरीर नहीं था, पारदर्शी, अनश्वर ऐसे जैसे हमारा नष्ट हो जाता है।
अगर वह नही मरा होगा, हो सकता है केवल समय उन अदृश्य और अव्यक्त लोगों को नष्ट करता हो क्यों ये पारदर्शी अचिन्हित शरीर एक जीवात्मा बन जाती है अगर वह भी बीमारी से दुर्बलताओ से अकाल मृत्यु से डरती है।
अकाल मृत्यु, मनुष्य का भय यहीं से प्रारम्भ होता है बाद में मनुष्य होरला ,उसके बाद वह रोज मरता है हर घंटे हर पल किसी भी दुर्घटना से, उसके बाद वह मनुष्य आता है जो अपनी मौत मरता है क्योंकि उसने अपने पूर्ण जीवन को जिया है।
नहीं, नहीं बिनाशक वह मरा नहीं है तब समझता हँू मुझे अपने को स्वयं को मार लेना चाहिये।