Friday, 25 September 2026

Horla Guy the maupassa 1

 होरला

           लेखक - गाई द मोपासा


   8 मई , ओह कितना खुशनुमा दिन है। आज मैंने सारा दिन घर के सामने घने छायादार चनार के पेड़ के नीचे घास पर लेटे लेटे बिता दिया। इसका मेरे पूर्वजों से संबंध है ,गहरी और जमी जड़ें किसी भी व्यक्ति को अपनी मिट्टी से बांधे रखती हैं ,यह घर मुझे बहुत अच्छा लगता है। खिड़की से बगीचे के किनारे बहती सीन नदी, दूसरे किनारे पर ऊँची सड़क,,इधर से उधर जाती नावंे दिखाई देती हैं ।

12 मई , मुझे पिछले कुछ दिन से बुखार आ रहा था । कह नहीं सकते कब रहस्यमयी मनोचेतनाऐं हमारी खुशियों को अवसाद में बदल देती है, हमारे आत्मविश्वास को हताशा में । तरंग ,अदृश्य तरंगे अनजान शक्तियों से संचरित हमारे चारों ओर घूमती हैं और उनकी रहस्यमय उपस्थिति हमें प्रभावित करती हैं । मैं प्रसन्न बहुत अच्छी मनोस्थिति के साथ जागा ।

मैं पानी के किनारे गया और कुछ दूर जाकर सहमा सा घर लौट आया , एक ठंडी लहर मेरी खाल पर से गुजर रही थी जो मेरा मनोबल गिरा रही थी। आसमान का रंग, या आसपास के वातावरण का रंग था , जो बार बार अपना रंग बदल लेता था, कुछ भी छुए, बिना जाने, जो कुछ भी हम करते हैं ,बिना वर्गीकरण किये तीब्रता से आश्चर्यजनक अव्यक्त प्रभाव हमारे स्नायुतंत्र पर पड़ता है उसके माध्यम से हमारे विचारों को प्रभावित करता है फिर हृदय को।

इस अव्यक्त की रहस्यमयता कैसी है ,हम अपनी इंद्रियों से नहीं व्यक्त कर सकते।  बहुत नजदीक है या बहुत दूर वह शांत प्रकृति को संगीत भरा कर देती है हमारी सूंघने की शक्ति जो कुत्ते की सूंघने की शक्ति से कम है हमारी स्वाद ग्रंथि जो शराब की उम्र नहीं बता सकती।

17 मई, मैं अपने चिकित्सक से मिला ,क्योंकि मैं सो नहीं पा रहा था। उसने बताया मेरी नाड़ी तेज चल रही है।  किसी विशेष बीमारी का कोई लक्षण नहीं मिला  ।

25 मई , मेरी दशा कुछ अजीब सी हैं । रात आते आते किसी अघटित का भय हावी हो जाता है ,मुझे नींद का डर ,अपने बिस्तर का डर सताने लगता है। 

दस बजे के करीब अपने कमरे का ताला खोलता हूँ मैैं डर जाता हूँ । मैं अपनी दराजें देखता हूँ ,पलंग के नीचे झांकता हूँ । एक असहजता की भावना मेरे रक्त में दबाब बढ़ा देती है । संभवतः स्नायुतंत्र गड़बड़ा जाता हैै। तब मैं बिस्तर पर जाता हूँ मैं नींद का इंतजार करता हूँ जैसे फांसी की सजा पाया व्यक्ति जल्लाद का इंतजार करता है। मेरा शरीर लिहाफ के अंदर कांपने लगता है । मैं नींद के आगोश में चला जाता हूँ 

 संभवतः दो और तीन घंटे ।,मुझे महसूस होता है कोई मेरे निकट आ रहा है मुझे छू रहा है । वह मेरे बिस्तर पर आ रहा है ।मेरी छाती पर झुक रहा है । मेरी गर्दन अपने हाथों में ले रहा है और अपनी पूरी शक्ति से दबा रहा है जिससे मेरा दम घुट जाय।

मैं सपने में लकवाग्रस्त हो रहा हूँ । मैं चिल्लाने की कोशिश करता हूँ लेकिन आवाज नहीं निकलती । मैं हिलना चाहता हूँ लेकिन हिल नहीं पाता । जोर से सांस लेता हूँ जिससे जो मुझे दबा रहा है ,मेरा दम घोट रहा है उसको उठाकर फेंक सकूँ ,लेकिन,मैं नहीं कर पाता।

और तब मैं एकाएक जाग जाता हूँ , कांपता हुआ पसीने से भीगा हुआ।

2 जून, मेरी दशा बिगड़ रही है , कभी कभी जंगलो की ओर घूमने निकल जाता हूँ । मैं सोचता हूँ कि ताजा रोशनी मंद शीतल ,जड़ी बूटियों की खुशबू लिये हवा मेरी नसों में नया खून भर देगी मेरे दिल को नई ताकत मिलेगी। मैं चौड़ी सड़क पर मुड़ जाता हूँ ,सहसा कंपकपी भर गई  । मैंने कदम बढ़ा दिये जंगल में अकेला हूँ । यह एहसास आते ही डर गया । एकाएक मुझे लगा मेरे पीछे कोई है वह मेरे कदम से कदम मिलाकर चल रहा है। मैं पलटा मुझे कुछ नहीं दिखाई दिया । ंमैं सीधा चला फिर उल्टा और जंगल के बीच में पहुंच गया। 

3 जून, मुझे कुछ दिन कहीं यात्रा पर निकल जाना चाहिये।

2 जुलाई , मैं वापस आ गया, बिल्कुल ठीक बहुत खुशनुमा यात्रा रही । मैं मौन्ट सैन्ट मिशेल गया कैसा सुदर दृश्य था । एक असाधारण बड़ी घाटी मेरे सामने थी । दो पहाड़ियों के बीच जो छुटपुटे में खोती जा रही थी,साफ सुनहरे आसमान में एक अलग सी पहाड़ी ।  सूर्य गायब हो गया ,अग्नि की लपट सी लिये आकाश में उस बलुई पहाड़ी का आकार उभरा उसकी चोटी पर एक प्रतीक चिह्न था।

भोर होते ही मैं वहाँ गया, मैंने देखा वह चर्च  था।  गहरी और संकरी सड़क चढ़कर विशाल चर्च की इमारत तक पहंुचा जो ईश्वर के लिये पृथ्वी पर बनाई गई थी इतनी बड़ी जितना कस्बा  ।

जब मैं चोटी पर पहुंचा तो मैने पादरी को देखा, हम उठती लहरों को देखते हुए बातें  करते रहे। 

तब मुझे पादरी ने कहानियाँ ,, आख्यान सुनाये कस्बे के आदमियों ने जो पहाड़ी थे कहा कि रात में कोई भी बालू पर आवाजें सुन सकता है । तब एक ने दो बकरियों को मिमयातें सुना। ‘असंभव ’ आदमियों ने कहा, यह केवल समुद्री पक्षियों की चीखें हैं जो कभी बकरी के मिमियाने की आवाज लगती है तो कभी आदमियों के रोने कलपने की । लेकिन स्वर्गीय मछुआरों ने कसम खा कर कहा था कि उन्होंने एक एक भेड़पालक को घूमते देखा था उसका सिर उसके लबादे में छिपा था । उसके पीछे एक बड़ा सा बकरा आ रहा था जिसका चेहरा मनुष्य का था और उससे छोटी बकरी जिसका चेहरा औरत का था दोनों के लम्बे सफेद बाल थे । दोनों झगड़ते बदजुवानी में बात करते चल रहे थे  और एकदम दोनों रुक गये और जोर-जोर से पूरी शक्ति से मिमियाने लगे।

‘आप इस पर विश्वास करते हैं? ’ मैंने पादरी से पूछा। ‘मैं नहीं जानता’,,‘अगर धरती पर अन्य जीव भी हमारे समानान्तर हैं यह क्यों है कि हम अभी तक नहीं जान पाये, यहां देखो, हवा प्रकृति में सबसे शक्तिशाली है । वह आदमी को गिरा देती है ं बड़ी बड़ी इमारतें धराशायी कर देती है पेड़ों को जड़ से उखाड़ देती है । जो गरजती है क्या तुमने उसे कभी देखा हैं? 

4 जुलाई ,मैं दोबारा बीमार हो गया मेरे रात्रि के स्वप्न लौट आये थे। पिछली रात को मुझे लगा था कि कोई मुझ पर झुका हुआ है और मेरे होठों के बीच मेरा जीवन चूस रहा है। हाँ वह मेरे गले से जोंक की तरह चूस रहा था मैं उठ गया़, मैं हिल भी नहीं पा रहा था ।

5 जुलाई,  क्या मैंने अपनी अक्ल खो दी है । जो रात में हुआ उसके विषय में सोचता हूँ तो मेरा दिमाग घूम जाता है। प्यास महसूस होने पर आधा गिलास पानी पिया ,देखा पानी की बोतल मुँह तक भरी हुई है। फिर मैं बिस्तर पर चला गया वही भयानक निद्रा । इस बार और भयानक झटका लगा। 

मैंने अपने आपको देखा छाती में खंजर घुसा हुआ है । सांस उखड़ रही है खून से लथपथ सांस नहीं ले पा रहा हूँ । मरने ही वाला हूँ और समझ नहीं पा रहा हूँ क्या यह मैं ही हूँ ।

होश ठिकाने आने पर मुझे फिर से प्यास लगी । मैंने मोमबत्ती जलाई और पानी की बोतल के पास गया । मैंने उसे उठाया वह खाली थी।  मैं एकदम इतने खतरनाक हद तक डर से जकड़ गया कि मुझे बैठना पड़ा । मैं भय और आश्चर्य से जड़ हो रहा था । पारदर्शी कांच की बोतल पर नजरें गड़ा दी । किसी ने पानी पी लिया था लेकिन किसने? मैं नींद में चलने लगा हूँ , दोहरी जिंदगी जिसके विषय में हमें पता ही नहीं होता है । हमारे अंदर दो व्यक्ति हैं या अजनबी, अनजान और अदृश्य । उन क्षणों में जब हमारी आत्मा जड़ हो रही है हमारे शरीर पर हावी हेा जाती है ,वह उसकी आज्ञा मानने लगती है ।


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Wednesday, 23 September 2026

bhajan

 जमुना किनारे घनश्याम बजावे बासुरिया 

मोहित भई सकल बृजवाला

मन में बसे सुघड़ घनश्याम 

छोड़ चली सब काम बजावे वंासुरिया

गूजँत धुन मुरली की वन में

राजत छवि बृज वाल कुजंन में

हैरत लै लै नाम बजावे बासुरिया

बैठै श्याम कदम की डारी

शोभा सुन्दर अति मन भाई 

देखत सखी तमाम बजावे बांसुरिया

लीला यदुनन्दन की न्यारी

भये रघुनाथ चरणा बलिहारी

भजमन आठो याम बजावे बांसुरिया 


122जल कैसे वो भरू जमुना गहरी जल कैसे वो भरू 

गोकुल जी से चली रे गुजरिया रामा 

हाथ गड़रूआ सिर गगरी हरी 

नौहर मंसू श्री श्याम तकत है रामा

बैठ मंसू भीजे चुदरी हरि हर भीजे चुदरी जल

होले चलू घर सास लड़ेगी रामा

जल्दी चली छनके गगरी हरी हर झलके गगरी 

123

मेरे नाथ का नाम दयानिधि है वो दया ही करेगें कभी न कभी 

वंशी भी सुनेंगें कभी न कभी दरशन भी देगें कभी न कभी 

मेरे नाथ है सारे अनाथो का धन सब छोड़ के इनसे लगा अपना मन

अब आन न पड़े तू इनकी शरणा तेरी हरी सुनेगें कभी न कभी 

निज भक्तों को आप उबारा किये उन्हें भव सागर से भी तारा 

मेरे नाथ भरोसा मेरा भी है उद्वार करेगें कभी न कभी 

घर द्वार पे इनको पुकारा किये पर इनका नही कही है पता 

ये छोड़ के लाख छिपेगें कही इन्हें ढूढ ही लेगें कही न कही

ये तो केवट है भव सागर के सबको ही पार लगाते हैं

मेरी नाव भवर में आन पड़ी इसे पार करेगें कभी न कभी 

मै तो बैठा हूँ राह को भूला हुआ बड़ी देर से इनको पुकार रहा 

मुझे आशा है भाग के आयेगें वो जब हरि सुनेगें कभी न कभी

संसार से नाता सब तोड़ो और इनके ही चरणों में आन पड़ो

मन प्रेम से राधे श्याम भजो हरि आप सुनेगें कभी न कभी 



124विनय कँरू सिर नाच चतुभुर्ज दीजे दरश दिखाय

झीर समुद्र सैन करैया शेषनाम की तुम्हारी शैया 

लक्ष्मी दावे चरणा चुतुभुर्ज दीजे दिखाय 

सिर पर मुकुट कान में कुण्डल केशर तिलक लगाय 

                                        नीलाम्वर पीताम्वर ओहे गल बैजन्ती माल 

                                         चतुभुर्ज दीजे दरश दिखाय

नाभि कुण्ड बह्ना उपजाये सारी सृष्टि आप रचाये

उर नर मुनि बलिहार चतुभुर्ज दीजे दरश दिखाय

वासुदेव श्री हरि बनवारी हरहु नाथ मम संकट भारी 

दीजे दरश दिखाय चतुभुर्ज दीजे दरश दिखाय


124तू टेड़ो तेरी टेड़ी गागरिया 

तू टेड़ो है नन्द बाबा को में टेड़ी वृषमान दुलरिया

टेड़ो ही टेड़ो मोर मुकुट है मेरी तो टेड़ी लाल सिर की इडुरिया

टेड़ो ही टेड़ो पंच रंग पेचों मेरी तो टेड़ी लाल सुरख चुनरिया 

जमुना भी टेड़ी टेड़ी कलंगी टेडी गोकुल की नागरिया 

चन्द्र सखी भज वाल कृष्णा छवि चिरजीवी रहो श्याम सुन्दरिया 


125हीरा मन तोता उड़ जायेगा

इन दूधों का गर्व न कीजे दूध विलैया पी जायेगी 

हीरा मन तोता उड़ जायेगा

इन धीयो का गर्वन कीजे धीय जमइया ले जायेगा 

हीरा मन तोता उड़ जायेगा

इन पूतों का गर्व न कीजे पूत पड़ोसी हो जायेगा 

हीरा मन तोता उड़ जायेगा

126

कहाँ जा छुपे हो प्यारे कन्हैया 

यहाँ लाज मेरी लुटी जा रही है 

दुशासन के हाथो तेरी द्रोपदी की 

सभा बीच साड़ी खिची जा रही है 

जिन्होने कभी मेरी सूरत न देखी 

के देखेगें नंगा वदन आज मेरा 

जुये में पति मेरे हारे है बाजी 

यह महलों की रानी लुटी जा रही है 

कहाँ जा छुपे हो प्यारे कन्हैया 

जिन्हें लोग कहते थे वीरो के राजा

अरे झुकता सारा जहाँ जिनके आगे 

वो देखो समय कैसा बदला हुआ है

वीरो की गर्दन झुकी जा रही है 

कहाँ जा छुपे हो प्यारे कन्हैया 

गुरू द्रोण बोलो पितामाह बोलो 

ये तुमसे तुम्हारी बहू पूछती है 

सभा में क्यों साड़ी खिंचवा रहे हो 

कहो कुछ जुवा क्या घिसी जा रही है 

कहाँ जा छुपे हो प्यारे कन्हैया 

अरे कोई सुनता है यहाँ पर न मेरी 

बुलाती है भैया बहन तुझको तेरी 

अगर देर सुन कर न आये मुरारी 

तेरी शान सारी घटी जा रही है 

कहाँ जा छुपे हो प्यारे कन्हैया 

खिंचा चीर जब ना दुःशासन था हारा 

मैं समझी थी भगवन तुम्हारा इशारा 

कि साड़ी के हर तार में तुम समाये 

इसी से ये साड़ी ख्ंिाची जा रही है 

कहाँ जा छुपे हो प्यारे कन्हैया 

127

देख री एक वाला जोगी द्वार हमारे आया है री

वाघम्वर को ओढ़ दुशाला शेष नाग लपटाया है री

माथे माल तिलक चन्द्रमा मोतियन माल पहने है री

जा योगी अपने आश्रम को मेरा लाला डराया है री

ना चाहिये तेरे हीरा मोती न चािहये तेरी माया है री

तेरे लाला के दाश दिखा साधू काशी से आया है री

ले बालक निकली नन्द रानी योगी दर्शन पाया है री

सात वेर परिकम्मा करके सिगी नाद बजाया है री

सूरदास बैकुण्ठ धाम में धन्य जशोमति मम्या है री

तीन लोक के कर्त्ता धर्त्ता तेरी गोदी आया है री 

128

आज ठाड़ो री बिहारी यमुना तट पै 

मत जइयो री अकेली कोई पनघट पर 

मुकुट लटक भृकुटि की मटक 

मन ग्योरी अटक कटि पीरो पट पे

नन्द जू को होना लखि धीरज धरो न

वीर ऐसो कछू टोना नटवर नट पे 

आज ठाड़ो री बिहारी यमुना तट पै

गुरूजन वास कैसे बसे बृजवास 

मन वन गयो दास घुघंरावली लट पे

आज ठाड़ो री बिहारी यमुना तट पै

छुटी कुल लाज गोपी आई आज भाज

रास रसिया को रास आज वंशीवट पे 

आज ठाड़ो री बिहारी यमुना तट पै

                                  129

जब से घनश्याम इस दिल में आने लगे

क्या कहे रंग क्या क्या दिखाने लगे

आये यूहिं जो एक दिन टहलते हुये

कुछ झिझकते हुये कुछ सम्हलते हुये

चुपके चुपके से दिल ले के चलते हुये

मैंने पकड़ा जो बाहर निकलते हुये 

मोहिनी डाल कर मुस्कराने लगे क्या कहे रग क्या 

एक दिन उनके आने का बतलाऊ 

आ गये जेव में ही लगाकर नकब 

बाँधकर ले चले मानो दिल माल सब

मैने देखा वो पूछा कि यह क्या गजब 

कुछ मचल कर के मुरली बजाने लगे 

क्या कहे रंग क्या क्या दिखाने लगे

एक दिन ख्याव में ही खड़े आप हैं

दिल उड़ाने की धुन में अड़े आप हैं

मैं बोला कि हजरत बड़े आप हैं

क्यों मेरे दिल के पीछे पड़े आप हैं

चोट चितवन की दिल पर चलाने लगे

इक दिन आप आये तो इस तौर से 

दर्द दिल बाके दिल में उठा जोर से 

देखा उन्हें जब बड़े गोर से 

माँगते फिर न आये किसी और से 

वन गये बिन्दु आँखों से जाने लगे

तब से धनश्याम दिल में समाने लगे

130

वेद्य वन कर के गोकुल से कान्हा चले 

गाँव बरसाने आना गजब हो गया 

जड़ी बूटी से झोली भरी श्याम में

उसमें वशी बजाना गजब हो गया

श्याम गलियों में आकर लगाई आवाज

कोई बीमार है आ गये वेद जी

हम तो दुखियों के देते मुफ्त बूटियाँ

बोली ऐसी सुनाना गजब हो गया 

आवाज दे के ललिता ने लीन्हो बुलाय

बड़े आदर से चौकी पे दीन्हे बैठाय

वेद्यजी देख लेना नवज को जरा 

दिल मचलता कमर दर्द सिर दर्द है 

ओर ओसर गवाना गजब हो गया 

हंस के बोले श्याम रोज कुछ भी नही 

हम तो पल भर में करते हैं सब दुख दूर

नैन कजरा लगा के गई हो कहीं

लड़ गये नैन से नैन जाकर कहीं

बोली ऐसी सुनाना गजब हो गया 

दिल दुखाना किसी का गजब हो गया ☺


Monday, 7 September 2026

vivah aur badhta apvyay

 विवाह और बढ़ता अपव्यय




      पास आती विवाह की तारीखें और मॉं बाप के माथे पर गहरी होती सलवटें। इतना तो इसमें खर्च हो जायेगा  इतना इसमें। एक एक कर बढ़ता बजट । रोज रोज तो 

शादी होती नहीं । फलां ने यह किया था अब कुछ न करें तो अच्छा नहीं लगेगा । समाज क्या कहेगा ? समाज का दिखाने के लिये कुछ करना है और कुछ नये ढंग से  करना है । और नवीनचंद्र हर जगह रहते हैं  नई थीम की सलाह ईवेंट मैनेजमैंट  देता है  और पूरा पैसा खींच लेता है ।

भारतीय संस्कृति में विवाह मनुष्य के सोलह संस्कारों में से एक प्रमुख संस्कार हैं। तीन संस्कार धूमधाम से मनाये जाते हैं जन्म विवाह और मृत्यु। बाकी के तेरह संस्कार मनाये जाते हैं लेकिन सूक्ष्म रूप से विवाह एक प्रकार से दूसरा ही जन्म हैं। इसलिये इसको विशेष उत्सव के रूप में मनाया जाता हे। वैसे यह सात वचन और अग्नि के सात फेरों के साथ-साथ जन्म का साथ निभाने की रस्म मात्र है।लेकिन सारे जीवन की बचत माता पिता अपने पुत्र पुत्री के विवाह में खर्च कर देते हैं। पहले भी विवाह में खर्च तो होता था लेकिन अधिकांष खर्च दान दहेज, दावत मिटाई बांटने आदि पर होता था। पहले निमन्त्रण पत्र भी आवष्यक नहीं था छपाया जाये । एक पीली चिट्ठी से न्योता मान लिया जाता था। पूर्व में बाहर के संबंध भी बहुत कम होते थे । स्थानीय लोग ही एक दूसरे से जुड़कर एक बड़ा परिवार बन जाता था और न्यौता नाई द्वारा घर घर जाकर लगाया जाता था। घर के बच्चे नाई के साथ जाते या बहन बेटियां। महफिल के नाम पर भी झालर आदि लग जातीं या चंदोबा तन जाता फूलों से कागज की पन्नियों से सज्जा होजाती थी। परिवर्तन समाज में तेजी से आया है कि अब अनावश्यक खर्च  आवष्यक खर्च हो गये हैं अब दिन व दिन दिखावा बढ़ता जा रहा है।

इस दस मिनट के अंदर हो सकने वाले कार्य के लिये यदि आस्ट्रेलिया से पूरा फूलों का जहाज आये, पूरा नगर बिजली की रोशनी से झिलमिलाऐ या एक नकली विशाल महल ही खड़ा कर दिया जाय यानि जिस खर्च से हजारों जिन्दगियों की रोटी जीवन भर चल सकती थी । पर यह तो रही अरबपतियों की शादी जिसके लिये न उन्हें किसी से उधार लेना पड़ा होगा न कर्ज, न घर जमीन बेचनी पड़ी होगी, हाँ इस चकाचौंध का असर मध्यवर्ग को और हीन बना गया, जो यह सोचता है कि यदि पूरा नगर सजाया गया है तो मैं क्या अपना घर भी नहीं सजा सकता और इसके लिये अपनी जमा पूँजी खर्च करते ही हैं कर्जदार भी बन जाते है। अगर कुछ भी कर पाने की हैसियत न हो तो लड़कियाँ बोझ बन जाती हैं। माता-पिता रात-दिन लड़कियों को देख-देख कर आह भरते हैं जिसमें लड़कियाँ मानसिक रूप से अपने को हीन समझने लगती है तथा सहम जाती है कि वे अपने माता-पिता के लिये समस्या बन गई हैं। इसकी परिणति इधर तो कई-कई लड़कियों द्वारा आत्महत्या किये जाने में हुई है।


Monday, 31 August 2026

smile

 

A football coach was always trying to exercise his players minds by asking them what they would do under such and such conditions at an important game.

Walking the sideline one day .He stopped where Smith was sitting and said.

‘’Smith If it were third down and 25 yards to go and were on our own 45 yard line .What would you do?”

“I’d move to the other side of bench so I could see the play better.”Smith Replied.

A small boy was proudly showing off his new baby sister .but his little friends scoffed at her red face.”Well”. the tot retorted.”I guess your face would be red . too .If you had to come all the way from heaven on a hot day like this.

Wednesday, 19 August 2026

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Friday, 31 July 2026

niyam

 नियम तो नियम है नियमों का क्या?  


नियम तो नियम है इनके लिये सोचना क्या ये तो हैं ही टूटने के लिये। बनते हैं टूटते हैं बनते हैं टूटते हैं और नियम बनते हैं किस के लिये। उस से सम्बन्धित सभी कर्मचारी, पुलिस, अधिकारी सबकी पीढ़ियाँ तर जाती हैं। जब जेब ढीली पड़ जाती है तब नियम की याद आ जाती है कि चलो नियम ढीले पड़ गये हैं कसा जाय जेब भी टाइट चल रही है।

पॉलिथिन बंद... हल्ला, होहल्ला गाय मरती है, नाले चोक होते हैं मिट्टी खराब होती है लेकिन मिट्टी खराब हो जाती है छोटे दुकानदारों की, ठेले वालों की एकदम से थैलियाँ जब्त, साथा ही फाइन। लाला चल अब कुछ दिन मौज कर अब अगली बार तुझ पर हाथ नहीं डालेंगे। और ठेले वाला धड़ल्ले से फिर थैलियाँ देता है सबकी जेब भी भर जाती है और पॉलिथिन अभियान खत्म।

दूसरे विभाग का अभियान चालू होता है । जब जिस चौराहे पर याद आती है और उसमें भी देखते हैं ,कौन मरगिल्ला पिद्दी सा है। सूट बूट वाले या दबंग से शान से बिना हैलमेट चलते हैं और उसकी बगल का टूटा सा स्कूटर  चलाने वाला पकड़ में आता है  जेब में पैसे नहीं हैं बेटा  घर जा बेटा पैसे  जा चाहे सिर फोड़ या टांग कटा।स्वयं पुलिस वाले कभी हैलमैट लगाये नहीं दिखेंगे उनका चालान भी कभी नहीं होता । नेताओं के बच्चे तो खुदा ही समझने लगते हैं और सारे नियम ताक पर रखते हैं पर सत्ता से बाप हटा और सारे अपराध खुदने लगते हैं अगर विरोधी पार्टी हो तो खुदाई गहरी हो जाती है।

नियम बना 10 बजे तक बैंडबाजा बरात का मोहल्लो के बरातघर बंद शोर से ट्रैफिक से जनता है परेशान हैरान जिसकी लाठी उसकी भैंस जो दबंग है 12 बजे तक शोर मचाये, बाजे बजाये, गोली दागे पटाखे चलाये बम फोड़े।जनता के कान फूटे, बीमार मरे दिल के मरीज की धड़कन बंद हो तो क्या फर्क पड़ता है शादी तो एक दिन होनी है मुहल्ले के कान तो रोज फूटते है सुबह 4 बजे ढोल नगाड़े से शुरू हो जाता है। बाबुल की दुआएं अब चाहे बाबुल कितना ही सुखी संसार के लिये दुआ देगा पर मुहल्ले का मुहल्ला बददुआ देगा जैसे तूने हमारी नींद उड़ाई भगवान तुम्हारी नींद उड़ाए जैसे तुमने हमे उठाये रखा है भगवान तुम सबको उठाये। अब शादी में नियम तो है कि जब तक पूरे जोश से पीपनी ( शहनाई)पर धुन न गाई बजाई जाय शादी शादी न मानी जाती।




डा॰ श्शश्शि गोयल                         





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