क मानसिक विकास के लिए आवश्यक है उन्हें खुला बातावरण मिले। अधिक से अधिक वार्तालाप खेलकूद और आपस में बच्चों के साथ उठना बैठना जरूरी है । पहले संयुक्त परिवार में ही हम उम्र बच्चे मिल जाते थे तब उन्हें हर तरह का पारिवारिक वातावरण मिलता था। मकान भी बड़े होते थे जहां खेलने कूदने के साधन भी रहते थे। एक दूसरे के साथ बांट कर खाना सोना पड़ना होता था।एक दूसरे को देखकर पढ़ते थे। अब अकेला बालक तो एक कोने में बैठा रील देखता रहता है यही उनका जीवन हो गया है । बचपन का भागना दौड़ना शरीर को मजबूत बना देता है और कम बीमार पड़ता है क्योंकि वह खुली हवा में अधिकांश जीवन व्यतीत करता है। मां बाप को फुरसत नहीं है कि बच्चे पर ध्यान दें वे अपने में व्यस्त हैं। वो कहते हैं हमें भी तो अपना जीवन जीना है इसलिए मां बाप का बंधन ,परिवार का बंधन उन्हें नहीं चाहि
Tuesday, 13 October 2026
Friday, 2 October 2026
Samay
आजकल किसी के पास समय नहीं है ,सब भाग रहे हैं,सड़क पर हैं तो इधर उधर कर कैसे भी आगे निकल जाऐं,चाहे नियम ताक पर रखने पड़ें या उनकी वजह से पीछे का ट्रैफिक रुक जाए पर आगे बढ़ाते चले जासेंगे कारण जल्दी है।,समय नहीं है। कुछ समय अपने ऊपर भी दिया करें कहा जाएगा तो जबाव मिलेगा समय कहां है अपने लिए समय ही नहीं मिलता सुबह होते ही भाग दौड़ शुरू हो जाती है।अब तो जब रिटायर होंगे तब अपने लिए समय निकालेंगे पर तब भी समय नहीं होता । शरीर की गति धीमी हो जाती है। एक एक काम में दुगना समय लगता है
ध्यान लगाना , अपने को आत्म केन्द्रित करना ,पर ध्यान लगता कहां है , सामने तो तसवीर आ जाती है यह करना है वह करना है,अरे आज यह तो किया ही नहीं,उफ और हो गया ध्यान,वही समय है कि सब कुछ याद आता है। उसी समय तो होश आता है कि हमारी आज की जीवन चर्या क्या है ? या याद आताजाता है विगत ,बीता कल और वही ध्यान का माध्यम बन जाएगा ।
हर व्यक्ति सुख की चाहना करता है आशीर्वाद भी दिया जाएगा कि सदा सुखी रहो ,पर दुःख है कि जरा जरा सी बात में आजाता है और जो सुख है उसे भूलकर दुःख को देखने लगते हैं कि हमारे साथ ऐसा क्यों हुआ?
Wednesday, 30 September 2026
bacche aur mobile
एक बार आपने बच्चे को मोबाइल की लत डाल दी फिर आपको होश आता है कि बच्चा हर समय मोबाइल देखने में व्यस्त है रात में भी मोबाइल चादर या रजाई के अंदर रखकर उसे ढककर देखता रहता है। आप मोबाइल छीनने और डांटने डपटने लगते हैं। पर तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। स्वयं अपने व्यवहार को देएक बार आपने बच्चे को मोबाइल की लत डाल दी फिर आपको होश आता है कि बच्चा हर समय मोबाइल खिये किआप कितनी देर मोबाइल में आंख गड़ाये रहते हैं,बच्चे का समय लीजिये और अपना दीजिये । अपने साथ छोटे छोटे कामों में व्यस्त करिये। हर काम में उसकी भागीदारी रहे उससे बात करें । कुछ समय उसके साथ खेलें एक साथ बैठें उठें। उसे लगना वाहिये िकवह घर का सदस्य है।स्वयं मोबाइल पर से आंख कम करें तब ही बचचे को समझ में आयेगी । अपनी आंखें मोबाइल पर,उंगलियां मोबाइल पर रखते हुए दूसरे हाथ से बच्चे से मोबाइल छीनने का प्रयास करने से बच्चा विद्रोही हो जायेगा। आपकी बात नहीं मानेगा । अधिक रोका राकी करने से वह अनुचित कदम उठा लेगा। इन सबसे बचने के लिए आवश्यक है स्वयं पर भी नियंत्रण रखें अगर हो सके तो परिवार में रहें बच्चे को तरह तरह से व्यस्त रखते हैं । कहानी सुनाकर या अन्य बच्चों के साथ खेलने जाकर।। उनका अकेलापन कम होगा । नौकर नौकरानी पर बच्चों को छोड़न्ेा की बजाय मां बाप को साथ रखें। नौकर नौकरानी के लिये वे केवल एक काम का हिस्सा हैं पर मां बाप दादा दादी नाना नानी के लिए वे उनके जीवन का हिस्सा हैं। सेवकों के लिसे काम का अतिरिक्त बोझ हैं तो मांबाप के लिए सूद जो मूल से अधिक प्यारा होता है ।
Saturday, 26 September 2026
Horla 3
मैंने स्पष्ट कहा, ‘मेरे पास इस समय तो पांच हजार फ्रेंक है नहीं, प्यारी बहन ’ । वह कुछ बुदबुदाई,‘ओह मैंने अनुरोध किया था , मेरा काम कर दो। मैं तुमसे भीख मांगती हूँ ,तुम्हें नहीं मालुम मैं किस कष्ट से गुजर रही हॅंू। मुझे आज ही पैसे चाहिये।’
4
मुझे उस पर दया आई ,‘ठीक है तुम्हें कैसे न कैसे मिल जायेंगे ,मैं कसम खाता हूँ ।’
‘ओह! धन्यवाद’
जब वह चली गई तब मैं डॉक्टर के पास गया उसने मेरी बात सुनी और मुस्कराता रहा।
4 अगस्त , मेरे नौकरों में झगड़ा हो गया उन्होंने बताया कि रात अलमारी में रखे गिलास टूट गये। झाड़ पोंछ वाले ने रसोइये पर इल्जाम लगाया । उसने बर्तन धोने वाली पर इल्जाम लगाया । कौन अपराधी है? जो भी है चालाक है ,कौन बतायेगा ?
6 अगस्त , इस बार मैं पागल नहीं हूँ कोई शक नहीं मैंने उसे देखा।
मैं दोपहर तेज सूर्य की रोशनी में दो बजे अपने बगीचे में गुलाब की क्यारियों के बीच टहल रहा था । मैं जाइंट बैटिले को देखने के लिये रूक गया उस पर तीन बहुत सुंदर गुलाब खिले थे।एक गुलाब की डंडी मेरी ओर झुकी, जैसे किसी अदृश्य हाथ ने उसे झुकाया हो, फिर फूल सीधा हो गया। फिर फूल ने अपने को ऊँचा किया जैसे कोई अपने मुँह तक सूंघने के लिये ले गया हो, वह हवा में खड़ा रहा एक सुर्ख लाल बिंदु की तरह मुझसे तीन गज दूर । हताशा में मैं उसे लेने लपका। मुझे कुछ नहीं मिला वह गायब हो गया था । तब मैं अपने ही प्रति क्रोध से भर गया। मैं डंडी को देखने झुका और मुझे वह झाड़ी पर ताजा तोड़ा हुआ मिला और दो अपनी डंडियों पर थे। अब मुझे विश्वास हो गया था कि दिन और रात मेरे पास कोई अदृश्य आत्मा है जो दूध पानी पर रहती है । वह चीजों को छू सकती है उन्हें ले सकती है उनकी जगह बदल सकती है । वह प्रकृति से मालामाल है । यद्यपि वह हमारी इंद्रियों को नहीं दिखाई देती लेकिन वह है मेरी छत के नीचे रहती है।
7 अगस्त , मैं शांति से सोया । उसने मेरे जग से पानी पी लिया पर मुझे परेशान नहीं किया। मैंने पागलों को देखा है और बुद्धिमानों को भी देखा है । शांत और जीवन के हर पहलू को अच्छी नजर से देखने वाले ,एकाएक उनके दिमाग पर पागलपन का दौरा पड़ता है और टुकड़ों में बंट जाता है और विशाल भयानक समुद्र की लहरों में जहाँ मेढक है शार्क हैं उनमें उतराने लगता है जिसे पागलपन कहते हैं।
मैं इंद्रजाल में भ्रमित हो रहा हूँ । यही घटना चक्र स्वप्न में भी मायाजाल फैला देता है जिससे हमें कोई आश्चर्य नही होता, क्योंकि हमारे सोचने की शक्ति और नियत्रित करने की ताकत सो जाती है जबकि हमारी कल्पना शक्ति जाग्रत हो जाती है । क्या यह संभव नहीं है कि हमारा सूक्ष्मतंत्र मूर्धन्य मस्तिष्क पर हावी हो गया हो जिसने मुझे लकवाग्रस्त कर दिया हो।
8 अगस्त ,आज बड़ी भयानक शाम थी। वह मेरे आसपास है मुझे देख रहा है उसने अपने को छिपा रखा है अगर प्रकट होकर अपनी अलौकिक शक्ति दिखा देता वह अच्छा था।
13 अगस्त ,जब हम पर कोई रोग आक्रमण करता है तब हमारे अंदर की सभी इंद्रिया टूट सी जाती हैं,ै हमारी ऊर्जा नष्ट हो जाती है । हमारी मांसपेशियां शिथिल हो जाती हैं ।
14 अगस्त, किसी ने मेरी आत्मा पर अधिकार कर लिया है और उस पर उसका नियन्त्रण है। कोई मुझसे सब करवा रहा है मैं कुर्सी में गड़ गया हूँ और कुर्सी ने जमीन इतनी कसकर पकड़ ली है कि कोई शक्ति उसे नहीं हिला सकती।
5
15 अगस्त, लगता है अंदर कोई प्रवेश कर गया है ,, दूसरी आत्मा जिसने नियत्रंण में ले लिया हो ,
6 अगस्त, किसी प्रकार मैं दो घंटे के लिये निकल लिया । एक कैंदी की तरह जिसे एकाएक अपनी कोठरी का दरवाजा खुला मिल गया हो। मैंने गाड़ीवान से घोड़े भगाने के लिये कहा, और मैं रोन पहुंच गया।
मैंने गाड़ी पुस्तकालय के निकट रूकवाई और डॉ॰ हरमन हैरेस्टस का प्राचीन और आधुनिक निवासियों पर शोध प्रबन्ध मांगा।
17 अगस्त , मैंने एक बजे सुबह तक किताब पढ़ी हैंरेस्टस दर्शनशास्त्र का विशेषज्ञ उसने उन अलौकिक शक्तियों के ऊपर लिखा था जो मनुष्य के चारों ओर घूमती रहती हैं। उसने उनकी उत्पत्ति उनका रहने का स्थान शक्ति, आदि पर विस्तार से लिखा था ,लेकिन जो मुझे पर हावी थी उसके विषय में कुछ नहीं था।
मैं सो गया, ठंडी रात में करीब तीन प्रहर बीत गये ,मैंने अपनी आंख खोली एक अजीब सी उलझन भरी सनसनाहट। पहले कुछ नहीं दिखा फिर लगा मेज पर रखी किताब का पन्ना पलटा । कमरे में हवा जरा भी नहीं आई थी ,दूसरा पन्ना जैसे किसी ने पलटा हो । मेरी कुर्सी खाली थी लेकिन मैं जानता था उस पर वह बैठा पढ़ रहा है। क्रोध से जानवरों की तरह मैं उसे पकड़ने झपटा । उसे मारने के लिये लेकिन कुर्सी पलट गई , कुर्सी मेज हिल गई लैंप गिर गया और बंद हो गया फिर खिड़की बंद हो गई जैसे कोई जाते जाते बंद कर गया हो।
19 अगस्त, मैं जानता हूँ मैंने रेव्यू डू मोन्डे साइन्टिफिक में पढ़ा है कि एक समाचार आया था पागलपन की महामारी का। यूरोप में मध्यकाल में सैन-पोलो मैं इसी प्रकार की बीमारी फैली थी । डरे हुए निवासी अपना घर छोड़ कर भागे थे । आह हम पर विपत्ति हैं वह आ गया है। मुझे अपना नाम चिल्ला कर बता रहा है , मैं सुन नहीं रहा हूँ । हाँ वह चिल्ला रहा है-मैं सुन रहा हूँ । वह दोहरा रहा है होरेला.. मैंने सुना होरला... वह आ गया है होरला।
ओह गिद्ध ने कबूतर खा लिया। भेड़िये ने मेमने को पकड़ लिया । शेर ने तीखे सींग वाले भैंसे को खा लिया। मनुष्य ने शेर को एक तीर से मार दिया, एक तलवार से बंदूक से । लेकिन होरला मनुष्य को वही बना देगा जो हमने बैल और घोड़े को बना दिया है पालित पशु ,अपना गुलाम, ,अपना भोजन केवल अपनी इच्छा शक्ति से।
हम हैं ब्रह्मांड में बहुत कम, हम और क्यों नहीं हैं? ? क्यों अन्य फूलों फलों वाले वृक्ष हैं । क्यों अग्नि हवा, पानी, मिट्टी के अलावा अन्य पदार्थ हैं। ये केवल चार तत्व हैं, केवल चार ही क्यों जो सब को पाल रहे हैं चालीस क्यों नहीं, चार सौ, चार हजार, सब कुछ कितना निरीह है, अनगढ़, जल्दीबाजी में बनाये गये। ओह हाथी और दरियाई घोड़े को देखो कितने भव्य और ऊँट कितने सौम्य लेकिन तितली एक उड़ता हुआ फूल मैं कल्पना करता हूँ इतनी बड़ी तितली दस संसारों के बराबर ,उसके पंखों की बनावट सुन्दरता रंग और पंखों का हिलना में बता भी नहीं सकता, मैं एक सितारे से दूसरे सितारे तक उड़ते देखता हूँ रोशनी से नहाते, उड़ते हुए संगीतमय सांसंे लेते और मनुष्य हर्षित उसे देखकर अत्यन्त सुख प्राप्त
6
करता है।
होरला वह मुझे डरा रहा है वह मुझे इन बेकार बातों को सोचने को मजबूर कर रहा है। वह मेरे अंदर हैं वह मेरी आत्मा बन रहा है मुझे उसे मारना होगा।
29 अगस्त , मुझे उसे मारना है, मैंने उसे देखा है मेरे पीछे एक बहुत बड़ी कपड़ों की आलमारी थी जिसमें दर्पण था जिसके आगे प्रतिदिन में दाढ़ी बनाने के लिये और कपड़े पहनने के लिये खड़ा होता उसमेें सिर से पैर तक देखने की मेरी आदत हो गई थी। मैं उसे धोखा देने के लिये लिखने का बहाना कर रहा था। वह मुझे देख रहा था मैंने महसूस किया, निश्चय ही वह मेरे कंधे पर झुका पढ़ रहा था, मैं उठ खड़ा हुआ मेरे हाथ बढ़े और तेजी से घूमे चारों ओर दोपहर का सा उजाला था लेकिन मुझे दर्पण में अपना अक्स नहीं दिख रहा था । मैंने उस विशाल साफ आईने को ऊपर से नीचे देखा, वह फिर बच जायेगा क्योंकि उसके अदृश्य शरीर ने मेरा अक्स भी अपने अंदर समा लिया है।
मैं डर गया, तब एकाएक मैं दिखाई देने लगा, धुंधला जैसे पानी मेरे ऊपर से बह रहा है जो हरपल साफ होता जा रहा है,
30 अगस्त, मैं उसे कैसे मारूँ, जहर दे दॅूं लेकिन वह पानी में मिलाते देख लेगा और तब...और क्या हमारा जहर उस अगोचर जिस्म पर असर करेगा ं ?
31 अगस्त ,मैंने रोन से एक लुहार लोहे का दरवाजा बनवाने के लिये भेजा, मुझे लोग डरपोक कहेंगे 10 सितम्बर, कल लोहार ने लोहे का शटर और दरवाजा लगा दिया, मैंने सब कुछ आधी रात तक खुला छोड़ दिया यद्यपि ठंड हो रही थी।
एकाएक मुझे लगा वह है , मैं धीरे से उठा और कुछ देर ऊपर नीचे करता रहा जिससे उसे कोई शक न हो और फिर तेजी से मैंने शटर बंद कर दिया, एकाएक मुझे लगा वह बेचैन मेरे चारो ओर घूम रहा है ,अब वह डरा हुआ मुझसे कह रहा है कि मुझे बाहर जाने दे मैंने पीठ दरवाजे की ओर करके इतना खोला कि मैं ही बाहर निकल सकूं मैं इतना लंबा हूँ कि चौखट तक मेरी लंबाई है। मैंने उसे अकेला बंद कर दिया । फिर मैं नीचे उतरा अपने ड्राइंगरूम में गया जो मेरे सोने के कमरे के नीचे था। मैंने दो लैम्प लिये उनका सारा तेल कालीन पर और सोफे पर फैला दिया सब जगह और उसमें आग लगा कर मैं बाहर निकला और ताला लगा दिया। मैं बाहर बगीचों में छिप गया, झाड़ियों के झुंड में । निचली खिड़की पर लपट दिखाई दी, एक लम्बी लाल लपट सफेद दीवार पर दिखाई दी और छत तक बढ़ चली मुझे लगा जैसे दिन निकल रहा है ,तभी दो अन्य खिड़कियों से लपटें निकलने लगीं। मैने देखा मेरे घर का निचला हिस्सा लाल तपता भट्टी हो गया था लेकिन एक चीख डरावनी तीखी दिल-दहलाने वाली चीख । एक औरत के रोने की आवाज सन्नाटे में गूंज गई । दो दुछत्ती की खिड़कियां खुलीं ओह मैं नौकरों को तो भूल ही गया मैंने उनकेेे डरे हुए चेहरे देखे ,े।
फिर डरा हुआ मैं गांव की ओर भागा, ‘बचाओ बचाओ! आग! आग! मै कुछ लोगों से मिला जो वहीं आ रहे थे मैं उनके साथ लौटा।
तब तक घर एक जलती चिता में बदल चुका था एक विशाल चिता, जिसमें आदमी जल रहे थे और वह भी जल रहा था। वह वह मेरा कैदी नया मालिक, होरला।
7
एकाएक सारी छत दीवारों के बीच गिर गई ओर एक आग का ज्वालामुखी आकाश की ओर उढ़ गया, आग की लहर झपटीँ वह उस भट्टी में था, मरा हुआ।मर गया ? शायद उसका शरीर, क्या उसका शरीर नहीं था, पारदर्शी, अनश्वर ऐसे जैसे हमारा नष्ट हो जाता है।
अगर वह नही मरा होगा, हो सकता है केवल समय उन अदृश्य और अव्यक्त लोगों को नष्ट करता हो क्यों ये पारदर्शी अचिन्हित शरीर एक जीवात्मा बन जाती है अगर वह भी बीमारी से दुर्बलताओ से अकाल मृत्यु से डरती है।
अकाल मृत्यु, मनुष्य का भय यहीं से प्रारम्भ होता है बाद में मनुष्य होरला ,उसके बाद वह रोज मरता है हर घंटे हर पल किसी भी दुर्घटना से, उसके बाद वह मनुष्य आता है जो अपनी मौत मरता है क्योंकि उसने अपने पूर्ण जीवन को जिया है।
नहीं, नहीं बिनाशक वह मरा नहीं है तब समझता हँू मुझे अपने को स्वयं को मार लेना चाहिये।
Horla 2
6 जुलाई , मैं पागल हो रहा हूँ फिर मेरी बोतल का पानी रात में कोई पी गया । कौन हो सकता है? हे ईश्वर! मुझे कौन बचायेगा ?
6 जुलाई को बिस्तर पर जाने से पहले मैंने जरा सी शराब, दूध, पानी, बै्रड और कुछ स्ट्रोबरी अपनी मेज पर रखदीं ,लेकिन कोई सारा पानी पी गया ,थोड़ा सा दूध, लेकिन शराब ब्रैड और स्ट्रोबरी को छुआ भी नही।
7 जुलाई को भी वही अनुभव दोबारा हुआ और आठ जुलाई को मैंने पानी और दूध नहीं रखा, कुछ भी नहीं छुआ गया।
अंत में नौ जुलाई केा मैने केवल दूध और पानी मेज पर रखा, मैंने बोतल को सफेद मलमल के कपड़े में लपेट दिया और अपने हाथ अपने होठ अपनी दाढ़ी को पेंसिंल के बुरादे से मल लिया और सो गया।
गहरी नींद ने मुझे आगोश में ले लिया ओर चौक कर जागा। मैं हिला भी नहीं चादर पर पेंसिंल के बुरादे का कोई निशान नहीं था । मैं मेज पर गया मलमल का कपड़ा ढक्कन पर कसकर बंधा था। मैंने डोरी खोली, मैं भय से कांप उठा, सारा पानी पी लिया गया था और दूध भी ! आह दिव्य ईश्वर तुम दिव्य हो मुझे शीघ्र ही पेरिस चले जाना चाहिये।
12 जुलाई, पेरिस चौबीस घंटे में ही मेरे दिमाग को शांत कर देगा। कल कुछ व्यापारिक काम और लोगों से मिलकर कुछ अच्छा लगा, जैसे मेरी आत्मा को शीतल हवा मिल गयी । मैंने शाम प्रांसिस नाटक घर में बिताई। अलैक्जेन्डर ड्यूमास के अभिनय और कल्पना शक्ति ने मुझे पूरी तरह ठीक कर दिया। शायद एकाकीपन दिमाग के लिये बहुत खतरनाक है
14 जुलाई , स्वाधीनता दिवस के जलूस में सड़कों पर बच्चों की तरह खुश होता आतिशबाजी और झंडे देखता चल रहा हूँ ,वैसे सरकारी तौर पर एक निश्चित दिवस पर खुश होना कहाँ की समझदारी है ? भेड़ो के झुंड की तरह भीड़ चल रही है ,अभी विद्रोह में बदल सकता है । हम ऐसे ही है ,खुश हो जाओ तो खुश हो जायेंगे । अगर कोई कहेगा जाओ पड़ोसी से लड़ो, तो लड़ने लगेंगे ,कहेगे सम्राट को वोट देा तो सम्राट केा वोट दे देंग,े अगर कहेंगे जनता को वोट दो जनता केा दे देंगे।
3
16 जुलाई , मैंने कुछ देखा वह मुझे बहुत परेशान कर रहा है । मैं अपनी चचेरी बहन मैंडम सबले के यहां गया वहॉं डा॰ पेरेन्ट जो स्नायुतंत्र विशेषज्ञ है वशीकरण द्वारा रोग का निदान करते हैं से मिला।
हमे उसने प्रकृति के रहस्य की ओर इंगित करते हुए कहा ,‘ जबसे मनुष्य ने सोचना प्रारम्भ किया, अपने को रहस्यों से घिरा पाया है जिन्हें वह बता नहीं पाता।
जब तक बुद्धि प्रारम्भिक अवस्था में होती है अदृश्य आत्माऐं उसके चारों और घूमती रहती है। जब वे उन्हें महसूस करने लगता है तब अलौकिक शक्ति का एहसास होता है। तब परियाँ, बौने भूत-प्रेत मैं कहूॅं तो भगवान का आस्तित्व ,वह किसी भी धर्म से आया ,सतही लेकिन बहुत ही वेबकूफी भरा अविश्वासनीय आविष्कार मनुष्य के दिमाग में उत्पन्न हुआ । बाल्तेयर ने कहा है, वह सत्य है भगवान ने मानव अपनी कल्पना से बनाया लेकिन मानव ने वापस भगवान को अपने सिक्के में ढाल लिया। मैसमर और कुछ अन्य व्यक्तियों ने हमें अलग रास्ते पर डाल दिया है । मेरी बहन जो जरा सहज ही विश्वास नहीं करती मुस्कराई डॉ॰ पेरेंट उससे बोले,‘ ‘क्या आपको मैं नींद की अवस्था में पहुंचा दूँ मैडम’
‘हाँ, अवश्य ।’
वह एक आराम कुर्सी पर बैठ गई डॉ॰ उसकी आंखों में एकटक देखने लगा। मैने देखा मैडम सबले की आंखों भारी होने लगी , दस मिनट में वह सो गई । ‘उसके पीछे जाओ,’ डाक्टर ने मुझसे कहा मैं उसके पीछे चला गया डाक्टर ने एक विजिटर कार्ड उसके हाथ मे दिया,‘ यह एक दर्पण है तुम्हें इसके अंदर क्या दिखाई देता है ?
‘वह हाथ के सफेद कागज को ऐसे देख रही थी जैसे दर्पण हो। डाक्टर ने मैडम सेबल से कहा ,‘जब तुम आठ बजे सुबह उठोगी , चचाजाद भाई को अपने होटल में बुलाओगी उससे 5 हजार फ्रैंक मांगोगी जो तुम से तुम्हारा पति मांगेगा । ’
फिर उसने उसे जगा दिया । अपने होटल लौट कर मैं सोने चला गया और सुबह करीब साढ़े आठ बजे मुझे मेरे नौकर ने जागाया उसने कहा, ‘मैडम सबले आप से तुरंत मिलना चाहती है।’
मैं जल्दी से तैयार हुआ और उसके पास गया।
वह कुछ चिढ़ी सी बैठी थी । उसने चेहरे से जालीदार आवरण हटाये बिना कहा, ‘भाई मुझे तुम्हारा सहयोग चाहिये।’
‘क्या?’
‘मैं बताना तो नहीं चाहती पर बताना पड़ा ,मुझे पंांच हजार फ्रैंक चाहिये।’
मै हकला उठा ,मुझे लगा कहीं वो मुझे डॉ॰ पेरेंट से मिलकर वेबकूफ तो नहीं बना रही है । उसे ध्यान से देखने पर मेरा शक उड़ गया । वह दुःख से कांप रही थी । मैं जानता था कि वह बहुत अमीर है । मैंने कहना जारी रखा,‘क्या तुम्हारे पति के पास पांच हजार फ्रैंक नहीं है ’ ।वह एक क्षण हिचकिचाई जैसे कुछ याद करने की कोशिश कर रही हो, तब बोली ,‘हाँ निश्चय ही उसने लिखा भी था।’
ram
vkt Hkh jke vkn'kZ gSa]muds HkDr gSa]ij jke dh rks dksbZ ikVhZ ugha FkhA mUgksaus rks izse dh /kkjk cgkbZ]tks mlesa vkrk x;k ihrk x;k vkSj ihdj r`Ir gksrk x;k]u mUgksaus ckaVk u dkVk u vyx fd;k]lcdks leku Hkko fn;k pkgs fu"kknjkt gks ;k jk{kjkt]okuj gks ;k x`)jkt] muds fy, lc ,d gh gSA
Friday, 25 September 2026
Horla Guy the maupassa 1
होरला
लेखक - गाई द मोपासा
8 मई , ओह कितना खुशनुमा दिन है। आज मैंने सारा दिन घर के सामने घने छायादार चनार के पेड़ के नीचे घास पर लेटे लेटे बिता दिया। इसका मेरे पूर्वजों से संबंध है ,गहरी और जमी जड़ें किसी भी व्यक्ति को अपनी मिट्टी से बांधे रखती हैं ,यह घर मुझे बहुत अच्छा लगता है। खिड़की से बगीचे के किनारे बहती सीन नदी, दूसरे किनारे पर ऊँची सड़क,,इधर से उधर जाती नावंे दिखाई देती हैं ।
12 मई , मुझे पिछले कुछ दिन से बुखार आ रहा था । कह नहीं सकते कब रहस्यमयी मनोचेतनाऐं हमारी खुशियों को अवसाद में बदल देती है, हमारे आत्मविश्वास को हताशा में । तरंग ,अदृश्य तरंगे अनजान शक्तियों से संचरित हमारे चारों ओर घूमती हैं और उनकी रहस्यमय उपस्थिति हमें प्रभावित करती हैं । मैं प्रसन्न बहुत अच्छी मनोस्थिति के साथ जागा ।
मैं पानी के किनारे गया और कुछ दूर जाकर सहमा सा घर लौट आया , एक ठंडी लहर मेरी खाल पर से गुजर रही थी जो मेरा मनोबल गिरा रही थी। आसमान का रंग, या आसपास के वातावरण का रंग था , जो बार बार अपना रंग बदल लेता था, कुछ भी छुए, बिना जाने, जो कुछ भी हम करते हैं ,बिना वर्गीकरण किये तीब्रता से आश्चर्यजनक अव्यक्त प्रभाव हमारे स्नायुतंत्र पर पड़ता है उसके माध्यम से हमारे विचारों को प्रभावित करता है फिर हृदय को।
इस अव्यक्त की रहस्यमयता कैसी है ,हम अपनी इंद्रियों से नहीं व्यक्त कर सकते। बहुत नजदीक है या बहुत दूर वह शांत प्रकृति को संगीत भरा कर देती है हमारी सूंघने की शक्ति जो कुत्ते की सूंघने की शक्ति से कम है हमारी स्वाद ग्रंथि जो शराब की उम्र नहीं बता सकती।
17 मई, मैं अपने चिकित्सक से मिला ,क्योंकि मैं सो नहीं पा रहा था। उसने बताया मेरी नाड़ी तेज चल रही है। किसी विशेष बीमारी का कोई लक्षण नहीं मिला ।
25 मई , मेरी दशा कुछ अजीब सी हैं । रात आते आते किसी अघटित का भय हावी हो जाता है ,मुझे नींद का डर ,अपने बिस्तर का डर सताने लगता है।
दस बजे के करीब अपने कमरे का ताला खोलता हूँ मैैं डर जाता हूँ । मैं अपनी दराजें देखता हूँ ,पलंग के नीचे झांकता हूँ । एक असहजता की भावना मेरे रक्त में दबाब बढ़ा देती है । संभवतः स्नायुतंत्र गड़बड़ा जाता हैै। तब मैं बिस्तर पर जाता हूँ मैं नींद का इंतजार करता हूँ जैसे फांसी की सजा पाया व्यक्ति जल्लाद का इंतजार करता है। मेरा शरीर लिहाफ के अंदर कांपने लगता है । मैं नींद के आगोश में चला जाता हूँ
संभवतः दो और तीन घंटे ।,मुझे महसूस होता है कोई मेरे निकट आ रहा है मुझे छू रहा है । वह मेरे बिस्तर पर आ रहा है ।मेरी छाती पर झुक रहा है । मेरी गर्दन अपने हाथों में ले रहा है और अपनी पूरी शक्ति से दबा रहा है जिससे मेरा दम घुट जाय।
मैं सपने में लकवाग्रस्त हो रहा हूँ । मैं चिल्लाने की कोशिश करता हूँ लेकिन आवाज नहीं निकलती । मैं हिलना चाहता हूँ लेकिन हिल नहीं पाता । जोर से सांस लेता हूँ जिससे जो मुझे दबा रहा है ,मेरा दम घोट रहा है उसको उठाकर फेंक सकूँ ,लेकिन,मैं नहीं कर पाता।
और तब मैं एकाएक जाग जाता हूँ , कांपता हुआ पसीने से भीगा हुआ।
2 जून, मेरी दशा बिगड़ रही है , कभी कभी जंगलो की ओर घूमने निकल जाता हूँ । मैं सोचता हूँ कि ताजा रोशनी मंद शीतल ,जड़ी बूटियों की खुशबू लिये हवा मेरी नसों में नया खून भर देगी मेरे दिल को नई ताकत मिलेगी। मैं चौड़ी सड़क पर मुड़ जाता हूँ ,सहसा कंपकपी भर गई । मैंने कदम बढ़ा दिये जंगल में अकेला हूँ । यह एहसास आते ही डर गया । एकाएक मुझे लगा मेरे पीछे कोई है वह मेरे कदम से कदम मिलाकर चल रहा है। मैं पलटा मुझे कुछ नहीं दिखाई दिया । ंमैं सीधा चला फिर उल्टा और जंगल के बीच में पहुंच गया।
3 जून, मुझे कुछ दिन कहीं यात्रा पर निकल जाना चाहिये।
2 जुलाई , मैं वापस आ गया, बिल्कुल ठीक बहुत खुशनुमा यात्रा रही । मैं मौन्ट सैन्ट मिशेल गया कैसा सुदर दृश्य था । एक असाधारण बड़ी घाटी मेरे सामने थी । दो पहाड़ियों के बीच जो छुटपुटे में खोती जा रही थी,साफ सुनहरे आसमान में एक अलग सी पहाड़ी । सूर्य गायब हो गया ,अग्नि की लपट सी लिये आकाश में उस बलुई पहाड़ी का आकार उभरा उसकी चोटी पर एक प्रतीक चिह्न था।
भोर होते ही मैं वहाँ गया, मैंने देखा वह चर्च था। गहरी और संकरी सड़क चढ़कर विशाल चर्च की इमारत तक पहंुचा जो ईश्वर के लिये पृथ्वी पर बनाई गई थी इतनी बड़ी जितना कस्बा ।
जब मैं चोटी पर पहुंचा तो मैने पादरी को देखा, हम उठती लहरों को देखते हुए बातें करते रहे।
तब मुझे पादरी ने कहानियाँ ,, आख्यान सुनाये कस्बे के आदमियों ने जो पहाड़ी थे कहा कि रात में कोई भी बालू पर आवाजें सुन सकता है । तब एक ने दो बकरियों को मिमयातें सुना। ‘असंभव ’ आदमियों ने कहा, यह केवल समुद्री पक्षियों की चीखें हैं जो कभी बकरी के मिमियाने की आवाज लगती है तो कभी आदमियों के रोने कलपने की । लेकिन स्वर्गीय मछुआरों ने कसम खा कर कहा था कि उन्होंने एक एक भेड़पालक को घूमते देखा था उसका सिर उसके लबादे में छिपा था । उसके पीछे एक बड़ा सा बकरा आ रहा था जिसका चेहरा मनुष्य का था और उससे छोटी बकरी जिसका चेहरा औरत का था दोनों के लम्बे सफेद बाल थे । दोनों झगड़ते बदजुवानी में बात करते चल रहे थे और एकदम दोनों रुक गये और जोर-जोर से पूरी शक्ति से मिमियाने लगे।
‘आप इस पर विश्वास करते हैं? ’ मैंने पादरी से पूछा। ‘मैं नहीं जानता’,,‘अगर धरती पर अन्य जीव भी हमारे समानान्तर हैं यह क्यों है कि हम अभी तक नहीं जान पाये, यहां देखो, हवा प्रकृति में सबसे शक्तिशाली है । वह आदमी को गिरा देती है ं बड़ी बड़ी इमारतें धराशायी कर देती है पेड़ों को जड़ से उखाड़ देती है । जो गरजती है क्या तुमने उसे कभी देखा हैं?
4 जुलाई ,मैं दोबारा बीमार हो गया मेरे रात्रि के स्वप्न लौट आये थे। पिछली रात को मुझे लगा था कि कोई मुझ पर झुका हुआ है और मेरे होठों के बीच मेरा जीवन चूस रहा है। हाँ वह मेरे गले से जोंक की तरह चूस रहा था मैं उठ गया़, मैं हिल भी नहीं पा रहा था ।
5 जुलाई, क्या मैंने अपनी अक्ल खो दी है । जो रात में हुआ उसके विषय में सोचता हूँ तो मेरा दिमाग घूम जाता है। प्यास महसूस होने पर आधा गिलास पानी पिया ,देखा पानी की बोतल मुँह तक भरी हुई है। फिर मैं बिस्तर पर चला गया वही भयानक निद्रा । इस बार और भयानक झटका लगा।
मैंने अपने आपको देखा छाती में खंजर घुसा हुआ है । सांस उखड़ रही है खून से लथपथ सांस नहीं ले पा रहा हूँ । मरने ही वाला हूँ और समझ नहीं पा रहा हूँ क्या यह मैं ही हूँ ।
होश ठिकाने आने पर मुझे फिर से प्यास लगी । मैंने मोमबत्ती जलाई और पानी की बोतल के पास गया । मैंने उसे उठाया वह खाली थी। मैं एकदम इतने खतरनाक हद तक डर से जकड़ गया कि मुझे बैठना पड़ा । मैं भय और आश्चर्य से जड़ हो रहा था । पारदर्शी कांच की बोतल पर नजरें गड़ा दी । किसी ने पानी पी लिया था लेकिन किसने? मैं नींद में चलने लगा हूँ , दोहरी जिंदगी जिसके विषय में हमें पता ही नहीं होता है । हमारे अंदर दो व्यक्ति हैं या अजनबी, अनजान और अदृश्य । उन क्षणों में जब हमारी आत्मा जड़ हो रही है हमारे शरीर पर हावी हेा जाती है ,वह उसकी आज्ञा मानने लगती है ।
uktiyan
gj cM+s dke dh 'kq#vkr NksVs ls gksrh gS ]lks NksVs ls 'kq: fd;k dke vius vki cM+k gks tkrk gS A
vkdk'k esa rkjs cgqr c<+ x;s ] ekavksa
ds vkapy ds pkan rkjksa esa cny x;s]
dfczLrku esa Ldwy [kqy x;k A
Qwyksa dh ekyk Qwy lh gYdh ugha gksrh xys
esa iM+rs gh cgqr Hkkjh gks tkrh gS D;ksafd ftEesnkjh c<+ tkrh gS
vke dk isM+ tc rd vke ugha vkrs lk/kkj.k
gh gksrk gS vke vkrs gh egRoiw.kZ gks tkrk gS A
Wednesday, 23 September 2026
bhajan
जमुना किनारे घनश्याम बजावे बासुरिया
मोहित भई सकल बृजवाला
मन में बसे सुघड़ घनश्याम
छोड़ चली सब काम बजावे वंासुरिया
गूजँत धुन मुरली की वन में
राजत छवि बृज वाल कुजंन में
हैरत लै लै नाम बजावे बासुरिया
बैठै श्याम कदम की डारी
शोभा सुन्दर अति मन भाई
देखत सखी तमाम बजावे बांसुरिया
लीला यदुनन्दन की न्यारी
भये रघुनाथ चरणा बलिहारी
भजमन आठो याम बजावे बांसुरिया
122जल कैसे वो भरू जमुना गहरी जल कैसे वो भरू
गोकुल जी से चली रे गुजरिया रामा
हाथ गड़रूआ सिर गगरी हरी
नौहर मंसू श्री श्याम तकत है रामा
बैठ मंसू भीजे चुदरी हरि हर भीजे चुदरी जल
होले चलू घर सास लड़ेगी रामा
जल्दी चली छनके गगरी हरी हर झलके गगरी
123
मेरे नाथ का नाम दयानिधि है वो दया ही करेगें कभी न कभी
वंशी भी सुनेंगें कभी न कभी दरशन भी देगें कभी न कभी
मेरे नाथ है सारे अनाथो का धन सब छोड़ के इनसे लगा अपना मन
अब आन न पड़े तू इनकी शरणा तेरी हरी सुनेगें कभी न कभी
निज भक्तों को आप उबारा किये उन्हें भव सागर से भी तारा
मेरे नाथ भरोसा मेरा भी है उद्वार करेगें कभी न कभी
घर द्वार पे इनको पुकारा किये पर इनका नही कही है पता
ये छोड़ के लाख छिपेगें कही इन्हें ढूढ ही लेगें कही न कही
ये तो केवट है भव सागर के सबको ही पार लगाते हैं
मेरी नाव भवर में आन पड़ी इसे पार करेगें कभी न कभी
मै तो बैठा हूँ राह को भूला हुआ बड़ी देर से इनको पुकार रहा
मुझे आशा है भाग के आयेगें वो जब हरि सुनेगें कभी न कभी
संसार से नाता सब तोड़ो और इनके ही चरणों में आन पड़ो
मन प्रेम से राधे श्याम भजो हरि आप सुनेगें कभी न कभी
124विनय कँरू सिर नाच चतुभुर्ज दीजे दरश दिखाय
झीर समुद्र सैन करैया शेषनाम की तुम्हारी शैया
लक्ष्मी दावे चरणा चुतुभुर्ज दीजे दिखाय
सिर पर मुकुट कान में कुण्डल केशर तिलक लगाय
नीलाम्वर पीताम्वर ओहे गल बैजन्ती माल
चतुभुर्ज दीजे दरश दिखाय
नाभि कुण्ड बह्ना उपजाये सारी सृष्टि आप रचाये
उर नर मुनि बलिहार चतुभुर्ज दीजे दरश दिखाय
वासुदेव श्री हरि बनवारी हरहु नाथ मम संकट भारी
दीजे दरश दिखाय चतुभुर्ज दीजे दरश दिखाय
124तू टेड़ो तेरी टेड़ी गागरिया
तू टेड़ो है नन्द बाबा को में टेड़ी वृषमान दुलरिया
टेड़ो ही टेड़ो मोर मुकुट है मेरी तो टेड़ी लाल सिर की इडुरिया
टेड़ो ही टेड़ो पंच रंग पेचों मेरी तो टेड़ी लाल सुरख चुनरिया
जमुना भी टेड़ी टेड़ी कलंगी टेडी गोकुल की नागरिया
चन्द्र सखी भज वाल कृष्णा छवि चिरजीवी रहो श्याम सुन्दरिया
125हीरा मन तोता उड़ जायेगा
इन दूधों का गर्व न कीजे दूध विलैया पी जायेगी
हीरा मन तोता उड़ जायेगा
इन धीयो का गर्वन कीजे धीय जमइया ले जायेगा
हीरा मन तोता उड़ जायेगा
इन पूतों का गर्व न कीजे पूत पड़ोसी हो जायेगा
हीरा मन तोता उड़ जायेगा
126
कहाँ जा छुपे हो प्यारे कन्हैया
यहाँ लाज मेरी लुटी जा रही है
दुशासन के हाथो तेरी द्रोपदी की
सभा बीच साड़ी खिची जा रही है
जिन्होने कभी मेरी सूरत न देखी
के देखेगें नंगा वदन आज मेरा
जुये में पति मेरे हारे है बाजी
यह महलों की रानी लुटी जा रही है
कहाँ जा छुपे हो प्यारे कन्हैया
जिन्हें लोग कहते थे वीरो के राजा
अरे झुकता सारा जहाँ जिनके आगे
वो देखो समय कैसा बदला हुआ है
वीरो की गर्दन झुकी जा रही है
कहाँ जा छुपे हो प्यारे कन्हैया
गुरू द्रोण बोलो पितामाह बोलो
ये तुमसे तुम्हारी बहू पूछती है
सभा में क्यों साड़ी खिंचवा रहे हो
कहो कुछ जुवा क्या घिसी जा रही है
कहाँ जा छुपे हो प्यारे कन्हैया
अरे कोई सुनता है यहाँ पर न मेरी
बुलाती है भैया बहन तुझको तेरी
अगर देर सुन कर न आये मुरारी
तेरी शान सारी घटी जा रही है
कहाँ जा छुपे हो प्यारे कन्हैया
खिंचा चीर जब ना दुःशासन था हारा
मैं समझी थी भगवन तुम्हारा इशारा
कि साड़ी के हर तार में तुम समाये
इसी से ये साड़ी ख्ंिाची जा रही है
कहाँ जा छुपे हो प्यारे कन्हैया
127
देख री एक वाला जोगी द्वार हमारे आया है री
वाघम्वर को ओढ़ दुशाला शेष नाग लपटाया है री
माथे माल तिलक चन्द्रमा मोतियन माल पहने है री
जा योगी अपने आश्रम को मेरा लाला डराया है री
ना चाहिये तेरे हीरा मोती न चािहये तेरी माया है री
तेरे लाला के दाश दिखा साधू काशी से आया है री
ले बालक निकली नन्द रानी योगी दर्शन पाया है री
सात वेर परिकम्मा करके सिगी नाद बजाया है री
सूरदास बैकुण्ठ धाम में धन्य जशोमति मम्या है री
तीन लोक के कर्त्ता धर्त्ता तेरी गोदी आया है री
128
आज ठाड़ो री बिहारी यमुना तट पै
मत जइयो री अकेली कोई पनघट पर
मुकुट लटक भृकुटि की मटक
मन ग्योरी अटक कटि पीरो पट पे
नन्द जू को होना लखि धीरज धरो न
वीर ऐसो कछू टोना नटवर नट पे
आज ठाड़ो री बिहारी यमुना तट पै
गुरूजन वास कैसे बसे बृजवास
मन वन गयो दास घुघंरावली लट पे
आज ठाड़ो री बिहारी यमुना तट पै
छुटी कुल लाज गोपी आई आज भाज
रास रसिया को रास आज वंशीवट पे
आज ठाड़ो री बिहारी यमुना तट पै
129
जब से घनश्याम इस दिल में आने लगे
क्या कहे रंग क्या क्या दिखाने लगे
आये यूहिं जो एक दिन टहलते हुये
कुछ झिझकते हुये कुछ सम्हलते हुये
चुपके चुपके से दिल ले के चलते हुये
मैंने पकड़ा जो बाहर निकलते हुये
मोहिनी डाल कर मुस्कराने लगे क्या कहे रग क्या
एक दिन उनके आने का बतलाऊ
आ गये जेव में ही लगाकर नकब
बाँधकर ले चले मानो दिल माल सब
मैने देखा वो पूछा कि यह क्या गजब
कुछ मचल कर के मुरली बजाने लगे
क्या कहे रंग क्या क्या दिखाने लगे
एक दिन ख्याव में ही खड़े आप हैं
दिल उड़ाने की धुन में अड़े आप हैं
मैं बोला कि हजरत बड़े आप हैं
क्यों मेरे दिल के पीछे पड़े आप हैं
चोट चितवन की दिल पर चलाने लगे
इक दिन आप आये तो इस तौर से
दर्द दिल बाके दिल में उठा जोर से
देखा उन्हें जब बड़े गोर से
माँगते फिर न आये किसी और से
वन गये बिन्दु आँखों से जाने लगे
तब से धनश्याम दिल में समाने लगे
130
वेद्य वन कर के गोकुल से कान्हा चले
गाँव बरसाने आना गजब हो गया
जड़ी बूटी से झोली भरी श्याम में
उसमें वशी बजाना गजब हो गया
श्याम गलियों में आकर लगाई आवाज
कोई बीमार है आ गये वेद जी
हम तो दुखियों के देते मुफ्त बूटियाँ
बोली ऐसी सुनाना गजब हो गया
आवाज दे के ललिता ने लीन्हो बुलाय
बड़े आदर से चौकी पे दीन्हे बैठाय
वेद्यजी देख लेना नवज को जरा
दिल मचलता कमर दर्द सिर दर्द है
ओर ओसर गवाना गजब हो गया
हंस के बोले श्याम रोज कुछ भी नही
हम तो पल भर में करते हैं सब दुख दूर
नैन कजरा लगा के गई हो कहीं
लड़ गये नैन से नैन जाकर कहीं
बोली ऐसी सुनाना गजब हो गया
दिल दुखाना किसी का गजब हो गया ☺
Monday, 7 September 2026
vivah aur badhta apvyay
विवाह और बढ़ता अपव्यय
पास आती विवाह की तारीखें और मॉं बाप के माथे पर गहरी होती सलवटें। इतना तो इसमें खर्च हो जायेगा इतना इसमें। एक एक कर बढ़ता बजट । रोज रोज तो
शादी होती नहीं । फलां ने यह किया था अब कुछ न करें तो अच्छा नहीं लगेगा । समाज क्या कहेगा ? समाज का दिखाने के लिये कुछ करना है और कुछ नये ढंग से करना है । और नवीनचंद्र हर जगह रहते हैं नई थीम की सलाह ईवेंट मैनेजमैंट देता है और पूरा पैसा खींच लेता है ।
भारतीय संस्कृति में विवाह मनुष्य के सोलह संस्कारों में से एक प्रमुख संस्कार हैं। तीन संस्कार धूमधाम से मनाये जाते हैं जन्म विवाह और मृत्यु। बाकी के तेरह संस्कार मनाये जाते हैं लेकिन सूक्ष्म रूप से विवाह एक प्रकार से दूसरा ही जन्म हैं। इसलिये इसको विशेष उत्सव के रूप में मनाया जाता हे। वैसे यह सात वचन और अग्नि के सात फेरों के साथ-साथ जन्म का साथ निभाने की रस्म मात्र है।लेकिन सारे जीवन की बचत माता पिता अपने पुत्र पुत्री के विवाह में खर्च कर देते हैं। पहले भी विवाह में खर्च तो होता था लेकिन अधिकांष खर्च दान दहेज, दावत मिटाई बांटने आदि पर होता था। पहले निमन्त्रण पत्र भी आवष्यक नहीं था छपाया जाये । एक पीली चिट्ठी से न्योता मान लिया जाता था। पूर्व में बाहर के संबंध भी बहुत कम होते थे । स्थानीय लोग ही एक दूसरे से जुड़कर एक बड़ा परिवार बन जाता था और न्यौता नाई द्वारा घर घर जाकर लगाया जाता था। घर के बच्चे नाई के साथ जाते या बहन बेटियां। महफिल के नाम पर भी झालर आदि लग जातीं या चंदोबा तन जाता फूलों से कागज की पन्नियों से सज्जा होजाती थी। परिवर्तन समाज में तेजी से आया है कि अब अनावश्यक खर्च आवष्यक खर्च हो गये हैं अब दिन व दिन दिखावा बढ़ता जा रहा है।
इस दस मिनट के अंदर हो सकने वाले कार्य के लिये यदि आस्ट्रेलिया से पूरा फूलों का जहाज आये, पूरा नगर बिजली की रोशनी से झिलमिलाऐ या एक नकली विशाल महल ही खड़ा कर दिया जाय यानि जिस खर्च से हजारों जिन्दगियों की रोटी जीवन भर चल सकती थी । पर यह तो रही अरबपतियों की शादी जिसके लिये न उन्हें किसी से उधार लेना पड़ा होगा न कर्ज, न घर जमीन बेचनी पड़ी होगी, हाँ इस चकाचौंध का असर मध्यवर्ग को और हीन बना गया, जो यह सोचता है कि यदि पूरा नगर सजाया गया है तो मैं क्या अपना घर भी नहीं सजा सकता और इसके लिये अपनी जमा पूँजी खर्च करते ही हैं कर्जदार भी बन जाते है। अगर कुछ भी कर पाने की हैसियत न हो तो लड़कियाँ बोझ बन जाती हैं। माता-पिता रात-दिन लड़कियों को देख-देख कर आह भरते हैं जिसमें लड़कियाँ मानसिक रूप से अपने को हीन समझने लगती है तथा सहम जाती है कि वे अपने माता-पिता के लिये समस्या बन गई हैं। इसकी परिणति इधर तो कई-कई लड़कियों द्वारा आत्महत्या किये जाने में हुई है।
Monday, 31 August 2026
smile
A
football coach was always trying to exercise his players minds by asking them
what they would do under such and such conditions at an important game.
Walking
the sideline one day .He stopped where Smith was sitting and said.
‘’Smith
If it were third down and 25 yards to go and were on our own 45 yard line .What
would you do?”
“I’d
move to the other side of bench so I could see the play better.”Smith Replied.
A
small boy was proudly showing off his new baby sister .but his little friends
scoffed at her red face.”Well”. the tot retorted.”I guess your face would be
red . too .If you had to come all the way from heaven on a hot day like this.
Wednesday, 19 August 2026
brij ke bhajan
115vuks[kks
tk;ks yyuk esa osnu esa lqu vkbZ
osnu
esa lqu vkbZ iqjkufu esa lqu vkbZ
eFkqjk
esa tkus tUe fy;ks xksdqy esa >wyks iyuk esa
ys
olqnso pys xksdqy dks tkds pju ijl xbZ ;equk
dkgs
dks tkdks cU;ks gS ikyuk dkgs ds ykxs Qqnuk
jru
tfMr dks cuks gS ikyuk js”ke ykxs Qwnuk
pUnz
lf[k Hkt ckyÑ".kk Nfo fpjthoks ;'kksnk ds yyuk
116eqjyh
okjs ';ke mBkns esjh eVdh
lcdh
xS;k vki pjkrs esjh xb;k dqtkas esa HkVdh
eqjyh
okjs ';ke mBkns esjh eVdh
lcdh
eVdh vki mBkrs esjh eVdh 'kh"k ij vVdh
eqjyh
okjs ';ke mBkns esjh eVdh
lcdh
uS;k vki f[koS;k esjh ub;k Hk¡oj fop vVdh
eqjyh
okjs ';ke mBkns esjh eVdh
lcdks
nj'ku vki fnoS;k esjh vf[k;k¡ nj'ku fcu HkVdh
eqjyh
okjs ';ke mBkns esjh eVdh
117
dkSu
fn'kk ls vk;ks js ckyd dgk rqEgkjks uke gS
dkSu
rqEgkjs ekrk firk tw dgk rqEgkjks xke gS
iwoZ
fn'kk ls vk;ks js ukfxu xksdqy gekjks xke gS
firk
uUn tw ekr ;'kksnk Ñ".kk gekjks uke gS
ds
ckyd rqe ex tks Hkwys dS ?kj ukfj fjlkb;k¡
dS
rqEgjs eu Øks/k mitks dS oSfju fojekb;k
uk
ukfxu esa ex tks Hkwyks uk ?kj ukfj fjlkb;k¡
uk
esjs eu esa Øks/k mitks uk osfju fojekb;k
yS
ckyd xy gkj ekyk lok yk[k dh Mksfj;k
lks
rks yS ?kj tkÅ js ckyd ukx ls nÅ pksfj;k
dgk
djks xy gkj ekyk lok yk[k dh Mksfj;k
o`Unkou
esa iM+ks fgMksyks ukx dh Mk: Mksfj;k
izHkq
ds lUeq[k dgr ukfxu tkmjs ckyd Hkftds
rsjks
:i ns[k n;k tks mits ukx ekjs tkx ds
Hkktw
rks dqy dw nkx ykxs vc Hkkts dSls cus
gksuh
gks; rks gks; ukfxu ukx rks ukps gh cus
pkslB
pksp ekjksfj ukfxu ukx dks tkŠtxkš
mBg¡
cyoUr ;ks/kk ckyd tw>u vkb;k¡
tc
mBs ty ds jktk liz rky ctkb;k
izHkq
ds eqdqV dw >iV yksUgks bUnzty xgjkb;k¡
118 ekjs
er eb;k opu Hkjok;ys
xaxk dh
lks [kok;ys pkgs tequk dh [kok;sys
{khj
lkxj esa eb;k rw BkM+ks djok;ds
ekjs er
eb;k opu Hkjok;ys
xb;u
lks [kok;ys pkgs cNM+u dh [kok;sys
uUn
ckck th ds vkxs pkgs BkM+ks djok;ys
ekjs er
eb;k opu Hkjok;ys
galks
dhlks [kok;sys pkgs oa'kh gh j[kokys
cynkÅ
ij Hkb;k gkFk ?kj ok;sys ekjs er
viuh
lks [kok;sys pkgs esjh lks [kok;sys
viuh
jk/kk ij eb;k gkFk /kj ok;ys ekjs er
xksdqy
esa upok;ys pkgs eFkqjk esa upok;ys
xksfiu
lax eb;k [kwc upok;sys ekjs er
119
viuksa
czt ns[ku dw¡ vk tb;ks fxj/kkjh dqoj dUgS;k
ge
xk¡o ds }kjs tequk ds [kM+s fdukjs
vjs
uSd xb;k vk; tjk tb;ks fxj/kkjh dqoj dUgS;k
vc
eFkqjk gh I;kjh gS xksdqy Hkh I;kjh gS
vjs
uSd ek[ku pk[ku vk tb;ks fxj/kkjh dqoj dUgS;k
vc
xk¡o xk¡o esa xwtsa dqatu esa Hkojk xwats
usd
buesa jkl jpk tb;ks fxj/kkjh dqoj dUgS;k
120vdsyh
fdl fy;s ou esa y[ku rqe NksM+ tkrs gks
eq>s
bl gky esa fdlds lgkjs NksM+ tkrs gks
[krk
D;k gks xbZ eq>ls tks fQj ou dks ik;k gS
;s ek;k
jke j?kqoj dh le> esa dqN u vk;k gS
eSa
cgkrh vk¡lw ij vklw¡ fd rqe eq[k eksM+ tkrs gks
;s dguk
jke ls tkdj rqEgsa iz.kke nklh dk
tud iqj
ds Lo;aEcj dk ;s ukrk rksM+ tkrs gks
tks
dguk Fkk lks dg Mkyk [kM+s D;ksa lj>qdk;s gks
p<+s
D;ksa yadk ij j?kqoj NqM+k dj D;ksa eq>s yk;s
lR; ij
vk¡p ugh vkbZ nsoks us Qwy cjlk;s
lrh
ukjh ds lr iFk ij rys D;ksa /kCck yxkrs gks
tks
eksM+h ihB y{ke.k us feys eqfu vkds lhrk ls
dgks
rqe dkSu dh iq=h firk dk uke crykvks
gks
ukjh dkSu jktu dh tks ou iFk ij i<kbZ gks
tud
jktk dh gw¡ iq=h llqj n'kjFk dgkrs gSa
eSa
iRuh jke j?kqoj dh gqdqe mudk fuHkkuk gS ☺
Friday, 31 July 2026
niyam
नियम तो नियम है नियमों का क्या?
नियम तो नियम है इनके लिये सोचना क्या ये तो हैं ही टूटने के लिये। बनते हैं टूटते हैं बनते हैं टूटते हैं और नियम बनते हैं किस के लिये। उस से सम्बन्धित सभी कर्मचारी, पुलिस, अधिकारी सबकी पीढ़ियाँ तर जाती हैं। जब जेब ढीली पड़ जाती है तब नियम की याद आ जाती है कि चलो नियम ढीले पड़ गये हैं कसा जाय जेब भी टाइट चल रही है।
पॉलिथिन बंद... हल्ला, होहल्ला गाय मरती है, नाले चोक होते हैं मिट्टी खराब होती है लेकिन मिट्टी खराब हो जाती है छोटे दुकानदारों की, ठेले वालों की एकदम से थैलियाँ जब्त, साथा ही फाइन। लाला चल अब कुछ दिन मौज कर अब अगली बार तुझ पर हाथ नहीं डालेंगे। और ठेले वाला धड़ल्ले से फिर थैलियाँ देता है सबकी जेब भी भर जाती है और पॉलिथिन अभियान खत्म।
दूसरे विभाग का अभियान चालू होता है । जब जिस चौराहे पर याद आती है और उसमें भी देखते हैं ,कौन मरगिल्ला पिद्दी सा है। सूट बूट वाले या दबंग से शान से बिना हैलमेट चलते हैं और उसकी बगल का टूटा सा स्कूटर चलाने वाला पकड़ में आता है जेब में पैसे नहीं हैं बेटा घर जा बेटा पैसे जा चाहे सिर फोड़ या टांग कटा।स्वयं पुलिस वाले कभी हैलमैट लगाये नहीं दिखेंगे उनका चालान भी कभी नहीं होता । नेताओं के बच्चे तो खुदा ही समझने लगते हैं और सारे नियम ताक पर रखते हैं पर सत्ता से बाप हटा और सारे अपराध खुदने लगते हैं अगर विरोधी पार्टी हो तो खुदाई गहरी हो जाती है।
नियम बना 10 बजे तक बैंडबाजा बरात का मोहल्लो के बरातघर बंद शोर से ट्रैफिक से जनता है परेशान हैरान जिसकी लाठी उसकी भैंस जो दबंग है 12 बजे तक शोर मचाये, बाजे बजाये, गोली दागे पटाखे चलाये बम फोड़े।जनता के कान फूटे, बीमार मरे दिल के मरीज की धड़कन बंद हो तो क्या फर्क पड़ता है शादी तो एक दिन होनी है मुहल्ले के कान तो रोज फूटते है सुबह 4 बजे ढोल नगाड़े से शुरू हो जाता है। बाबुल की दुआएं अब चाहे बाबुल कितना ही सुखी संसार के लिये दुआ देगा पर मुहल्ले का मुहल्ला बददुआ देगा जैसे तूने हमारी नींद उड़ाई भगवान तुम्हारी नींद उड़ाए जैसे तुमने हमे उठाये रखा है भगवान तुम सबको उठाये। अब शादी में नियम तो है कि जब तक पूरे जोश से पीपनी ( शहनाई)पर धुन न गाई बजाई जाय शादी शादी न मानी जाती।
डा॰ श्शश्शि गोयल
Wednesday, 29 July 2026
kaviyon se khed sahit
कवियों से क्षमा सहित खेद रहित
नाच हो या गाना , खाना हो या पीना हो सर्र से कवियों पर चिट्ठी पहुंच जायेगी फलां दिन कवि सम्मेलन है आप सादर आमंत्रित हैं,और कुछ नखरे से कुछ अखरे से कुछ बकरे से मंच पर हाजिर होते हैं और बैठे होते हैं जनता के यथार्थवादी भुक्तभोगी लोग, जिनकी जेबों में भी कुछ टीपी कुछ लीपी कविताऐं होती हैं कि अवसर मिले तो थोड़ा सा बदला कवियों से वो भी लेलें कि तुमको इतनी देर मैंने झेला अब तुम भी झेलो।
यहां कवि सम्मेलन में उठती आवाजें एक भी मेरी नहीं है हां जो जो शब्द कानों में पड़े वो ही हैं इसलिये सभी आदरणीय कवियों से क्षमा चाहते हुए जनता जनार्दन की आवाज सुना रही हंू
कल तक तो यहीं था
मेरा घर कहां गया (रमेश गौड़)
अवैध निर्माण होगा कॉरपोरेशन वाले उठा ले गये होंगे
कितना जिया कितना मरा
यह सवाल खुद से पूछा ( रमानाथ अवस्थी)
डाक्टर की फीस देदेते वही बता देता न देते तो पूरा मर जाते
एक ने वाह भरी पीछे से आवाज आई क्यों बजा रहा है साले दोबारा सुना देगा जल्दी निपटने दे।,तो दूसरा बोला जब खुद से ही पूछ रहा है तो हमें क्यों सुना रिया है , नींद में बोलने की बीमारी है क्या?
स्वतंत्रता मंगलमय हो
गोपाल प्रसाद व्यास
अमंगल तुम्हारे लिये होगा नेताओं का तो मंगल ही मंगल है जनता तो फ्राई है
सुमति सुरक्षा
कोई और कठिन शब्द नहीं मिला डिक्शनरी में
डाकिये ने द्वार खटख्टाया
अनबांचा पत्र लौट आया (माया गोविंद)
आगे से पूरा टिकिट लगाना नहीं लौटेगा
भवानी मिश्र जी ने शुरू किया ,मै गीत बेचता हूं, जी हां हजूर मैं गीत बेचता हूं
‘ नीचे उतर कर आओ एक ही गीत कब से बेच रहे हो हिसाब दो बिक्री कर दिया या नहीं।’
‘प्रार्थना मत कर मत कर मतकर( हरिवंश राय बच्चन)
तुम क्यों करोगे प्रार्थना मजे आ रहे हैं प्रार्थना तो हम कर रहे हैं जो सुने जा रहे हैं।
‘ मेरी मां ने पिल्ला पाला’ अभी कवि ने शुरू ही किया था पीछे से आवाज आई
‘और मंच पर छोड़ दिया’
अभी इतना ही ,कवि सम्मेलन तो होते रहते हैं आवाजें आती रहती हैं ये तो एक यादगार कवि सम्मेलन था ।
Sunday, 31 May 2026
Brij ke Bhajan
108
mB djys Hktu Hkxoku~ dk
rsjs thou dk ;gh bd lkj gS
fcuk cUnxh Hktu Hkxoku~ ds
rsjk thou ;wagh csdkj gS A
tue feyk rq>s vueksy
ghjk ekVh esa D;ksa [kks fn;k
ftl ekxZ ls tkuk rq>s
Fkk mlh dks dkaVksa ls cks fn;k
;s u tkuk fd >wBk lalkj gS vkSj >wBh ;s
ekSt cgkj gS
;s nqfu;k
esyk pdk pkSa/k dk vkf[kj rks ;gka va/kdkj gS
bl nqfu;k dh eksg eerk esa
rwus izHkq dks Hkqyk fn;k
fo"k; fodkjksa ca/kdj
eksg esa thou lkjk yqVk fn;k
bl uS;k esa rw lokj gS ogh
uS;k rsjh e>/kkj gS
fcuk Hktu Hkje irokj ds
dHkh gksxk u csM+k ikj gS
Hkw[kk ejs dksbZ I;klk ejs
dksbZ rq>dks fdlh dh fQØ ugha
lR; vfgalk vkSj /keZ dk
rsjh tqck ij ftØ ugha
lkjh chrh ;wagh >wB esa
csbZekuh ls fd;k O;kikj gS
tjk eu esa rw vius lkspys
rwus dkSu lk fd;k midkj gS
iki djks pkgs djks HkykbZ
,slk dHkh ugha gks ldrk
vkSjksa dks nq%[k nsus
okyk lq[k ls dHkh ugha lks ldrk
tSlk cks;sxk oSlk dkV ys
;gh deksZa dk [kqyk cktkj gS
ftu deksZa ds thrs thr gS
mu deksZa ds gkjs gkj gS
nqfu;k esa jgdj thrs tks
eu dks oks izk.kh lcls cyoku
NksM+ ns rw cfn;ksa dks
ukgd blesa gS rsjk dY;ku
Hko lkxj ls Hkh rj tk;sxk
xj izHkq ls lPpk I;kj gS
tks HkfDr dh vka[kksa ls
ns[krk mls izhre dk gksrk nhnkj gS
mB dj ys Hktu Hkxoku dk
·
109tUes tUes
gS eFkqjk esa Ñ".kk eqjkjh [koS;k ek[ku feJh ds
v/kZjkr dks
dkjkx`g esa cklqnso pUnz us tue fy;ks
ekrfirk
clqnso nsodh nksuksa dks vfr lq[k fn;ks
yxrs Hkknksa
vkBsa dks izxVs yky [koS;k ek[ku fe'kjh ds
rkys QkVd ds
lc VwVs iSjksa dh csM+h VwVh
lks;s
igjsnkj gFkdM+h gkFku dh [kqn gh VwVh
ikuh cjl
jgks cs'kqekj [koS;k ek[ku fe'kjh ds
ys clqnso
pys xksdqy dks tequk ty c<+ vk;ks
tku firk
ladV esa Ñ".kk pUnz us iko uhj esa yVdk;ks
Nwrs gh
pj.kks dks gS x;ks ikj [koS;k ek[ku fe'kjh ds
tlqnk dU;k
tUeh okdw [kcj iM+h rd uk;
dU;k ybZ
mBk; ';ke dks nhUgks ogh lqok;
ykSVs
dkjkx`g esa tequk th ds ikj [koS;k ek[ku fe'kjh ds
cUn gq;s
QkVd ds rkys csM+h iSjks esa iM+ xbZ
tkxs igjsnkj
gFkdM+h gkFku esa iM+ xbZ
dgrs xksfoUn
dh yhyk gS vijEikj [koS;k ek[ku fe'kjh ds
110 rtks
js eu gfj foeq[ku dks lax
ftuds
lax dqefr mitr gS ijr Hktu esa Hkax
dgk
gksr i; iku djk;s fo"k ugh rtr Hkqtax
rtks js
eu gfj foeq[ku dks lax
dkxfg
dgk diwj pqjk;s Loku ugk;s xax
jcj dks
dgk vxjtk ysiu ejdV Hkw"ku vax
rtks js
eu gfj foeq[ku dks lax
xt dks
dgk lfjr ugk;s cnqj/kjs ;g <ax
ikgu
ifrr oku ugh os/kr jhrks djr fujkax
rtks js
eu gfj foeq[ku dks lax
lwjnkl
dkjh dkefj ij p<+s u nwtks jax
rtks js
eu gfj foeq[ku dks lax
111
rqe
rft vkSj dksu ij tk¡Å
dkds
}kj tk; flj uk¡Å ijgFk dgk¡ fodkÅ
,slks
dks nkrk gS lejFk tkds fn;s v/kkÅ
vardky
rqEgjs lqeju xr vur dgw¡ ugh nkÅ
jad
lqnkek fd;ks vKkph fn;ks vo/k in okÅ
dke/ksuq
fpUrk ehjk nh;s dYio`{k rj Nk¡Å
Hko
leqnz vfr ns[k Hk;kud eu esa vf/kd Mjkš
dhts
Ñik lqfej viuks iqfu lwjnkl cfy tkÅ¡
112ifu;k
dks tk¡Å lax xbZ uunh
ckxks
xbZ dh lax xbZ uunh
efy;k
dks ns][k fond xbZ uunh
ifu;k
dks tk¡Å lax xbZ uunh
rkyks
xbZ Fkh lax xbZ uunh
/kksfo;k
dks ns[k epy xbZ uunh
ifu;k
dks tk¡Å lax xbZ uunh
iu?kV
xbZ Fkh lax xbZ uunh
egjk
dks ns[k fopd xbZ uunh
ifu;k
dks tk¡Å lax xbZ uunh
eSds
xbZ Fkh lax xbZ uunh
esjs
HkS;k dks ns[k fQly xbZ uunh
113
lcls
šph izse lxkbZ
nq;ksZ/ku
dh esok R;kxh lkx fonqj ?kj ikbZ
>wBs
Qy 'kojh ds [kk;s cgq fof/k izse yxkbZ
izse
foo'k u`i lsok dhUgh rk;s >wB mBkbZ
izse
ds o'k vtqZu jFk gkWdks Hkwy x;s BdqjkbZ
,slh
izhr c<+h o`Unkou xksfiu ukp upkbZ
lwj
dwj bl yk;d ukfg dn yksx djs cM+kbZ
114 izHkq
vc fdlds }kjs tkÅ
lc rt 'kj.kk
rqEgkjh yhUgh rqels gh usg yxk¡Å
eksg
tky ls osfx mckjks izse lq/kk jl ik¡Å
r`".kk
osfju lax lx Mksyr tklks vfr ?kcjkÅ
,slh
Ñik Ñike; dhts tx ls eksg gVk¡Å
'okl 'okl
ij rsjh jVu gks eaxy eksn c<+k¡Å
àn; cus
rsjk efUnj >wyk usg Hkqyk¡Å
vc
Ñikyq izHkq ,slh dfjgks Qwyh ugh lekÅ☺