विवाह और बढ़ता अपव्यय
पास आती विवाह की तारीखें और मॉं बाप के माथे पर गहरी होती सलवटें। इतना तो इसमें खर्च हो जायेगा इतना इसमें। एक एक कर बढ़ता बजट । रोज रोज तो
शादी होती नहीं । फलां ने यह किया था अब कुछ न करें तो अच्छा नहीं लगेगा । समाज क्या कहेगा ? समाज का दिखाने के लिये कुछ करना है और कुछ नये ढंग से करना है । और नवीनचंद्र हर जगह रहते हैं नई थीम की सलाह ईवेंट मैनेजमैंट देता है और पूरा पैसा खींच लेता है ।
भारतीय संस्कृति में विवाह मनुष्य के सोलह संस्कारों में से एक प्रमुख संस्कार हैं। तीन संस्कार धूमधाम से मनाये जाते हैं जन्म विवाह और मृत्यु। बाकी के तेरह संस्कार मनाये जाते हैं लेकिन सूक्ष्म रूप से विवाह एक प्रकार से दूसरा ही जन्म हैं। इसलिये इसको विशेष उत्सव के रूप में मनाया जाता हे। वैसे यह सात वचन और अग्नि के सात फेरों के साथ-साथ जन्म का साथ निभाने की रस्म मात्र है।लेकिन सारे जीवन की बचत माता पिता अपने पुत्र पुत्री के विवाह में खर्च कर देते हैं। पहले भी विवाह में खर्च तो होता था लेकिन अधिकांष खर्च दान दहेज, दावत मिटाई बांटने आदि पर होता था। पहले निमन्त्रण पत्र भी आवष्यक नहीं था छपाया जाये । एक पीली चिट्ठी से न्योता मान लिया जाता था। पूर्व में बाहर के संबंध भी बहुत कम होते थे । स्थानीय लोग ही एक दूसरे से जुड़कर एक बड़ा परिवार बन जाता था और न्यौता नाई द्वारा घर घर जाकर लगाया जाता था। घर के बच्चे नाई के साथ जाते या बहन बेटियां। महफिल के नाम पर भी झालर आदि लग जातीं या चंदोबा तन जाता फूलों से कागज की पन्नियों से सज्जा होजाती थी। परिवर्तन समाज में तेजी से आया है कि अब अनावश्यक खर्च आवष्यक खर्च हो गये हैं अब दिन व दिन दिखावा बढ़ता जा रहा है।
इस दस मिनट के अंदर हो सकने वाले कार्य के लिये यदि आस्ट्रेलिया से पूरा फूलों का जहाज आये, पूरा नगर बिजली की रोशनी से झिलमिलाऐ या एक नकली विशाल महल ही खड़ा कर दिया जाय यानि जिस खर्च से हजारों जिन्दगियों की रोटी जीवन भर चल सकती थी । पर यह तो रही अरबपतियों की शादी जिसके लिये न उन्हें किसी से उधार लेना पड़ा होगा न कर्ज, न घर जमीन बेचनी पड़ी होगी, हाँ इस चकाचौंध का असर मध्यवर्ग को और हीन बना गया, जो यह सोचता है कि यदि पूरा नगर सजाया गया है तो मैं क्या अपना घर भी नहीं सजा सकता और इसके लिये अपनी जमा पूँजी खर्च करते ही हैं कर्जदार भी बन जाते है। अगर कुछ भी कर पाने की हैसियत न हो तो लड़कियाँ बोझ बन जाती हैं। माता-पिता रात-दिन लड़कियों को देख-देख कर आह भरते हैं जिसमें लड़कियाँ मानसिक रूप से अपने को हीन समझने लगती है तथा सहम जाती है कि वे अपने माता-पिता के लिये समस्या बन गई हैं। इसकी परिणति इधर तो कई-कई लड़कियों द्वारा आत्महत्या किये जाने में हुई है।