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सबसे अधिक सबको दुःखी करता है कि मेरे पास किसी और पड़ोसन की कोई चटपटी खबर नहीं होती यद्यपि हर दिन कोई न कोई पड़ोसन दूसरी पड़ोसन की खबर सुना जाती है। मैं भी ‘हाय दैया! ऐसा, कहती सुनती हूँ, अच्छा मैंने तो नहीं सुना। ’
पहले कथा कहानियों में ,अखबार में, फिल्मों में हम आदर्श पाते थे और अपने गिरने का दुख होता था। हम भी ऐसे बनेंगे, अब हमारा कितना मनोबल उठ गया हैं की हीरो से ,नेताओं से ,नायक से गालियां सुनते हैं और सुनाने वाला अपना काॅलर ऊँचा करता है, वह देश का हीरो है।
तुमने कुचले हैं मिट्टी के घरौंदे,
कितने सपनों को उसके नीचे दबाया होगा।
कोई कथित कीड़ा ही दफन मिट्टी से,पाके मिट्टी की ताकत सरमाया होगा।
श्रद्धेय नीरज जी से खेद सहित-मानव होन पाप है गरीब होना अभिशापबन्दर होना भाग्य है जिम्पाजी होना साॅभाग्यएक टीवी ऐड में चिम्पैजी को च्यवनप्राश खिलाया जाता देख कर तो यही लगता है जैसे श्री राम जी दूरदर्शी थे । उन्हें मालुम था एक बार आदमी फिर बन्दर बनेगा फिर चिम्पैजी । वही उसका लक्ष्य होगा कम से कम च्यवनप्राश तो खाने को मिलेगा आदमी को तो सूखी रोटी नसीब नहीं है । कुछ दिन में तो महाराणा प्रताप की तरह घास पर ही जिन्दा रहेगा बहुत हुआ तो इधर उधर उगे जंगली फल ही खा लेगा ।
यह सब मिलकर आपके शरीर पर एकदम असर करेंगे। अगर आप कोठी मेें रहती हैं तो या मकान में ही जहां आप होगी आप को जब भी जरूरत होगी नौकर को दूसरे छोर पर पायेंगी। चीखने में तो पूरा दम लगता ही है और यदि बुलाने जायेंगी तो बार बार चक्कर लगाने पड़ेंगे जिससे कि आप की अच्छी खासी कसरत हो जायेगी।
घर में किसी से कह भी नहीं सकती कि छटी की पढ़ाई पढ़ाने में असमर्थ हूँ। सब मेरी पी.एच.डी. की डिगरी छीनने को तैयार हो जायेंगे, या कहेंगे न पढ़ाने के बहाने है। बताओ छटी और चैथी को नहीं पढ़ा पा रही हैं। चुपचाप ध्यान लगाकर अल्पी और वेबू की पुस्तकों का अध्ययन मनन करती हूँ
डालकर पर्दा न जाने क्या छिपाती है ?चीर कर पर्दा किसी पर कहर ढाती है,
इन पर्दानशी आंखों में कैसा जादू है
डाल दी नजरें तो सासें थम सी जाती है।
काला चश्मा और सफेद कपडे अब नेता की पहचान बन गये हैं जितना बड़ा नेता उतने सफेद कपड़े और उतना गहरा काला चश्मा। किसी से नजर न मिले और उनकी नजर सबके हावभाव देखती रहे।
दाह संस्कार और मृत्यु, विमान उठने के समय चश्मा न पहना तो सेलीब्रेटी क्या ?अलग लगना चाहिये ।
कि अगर उनका भाई या मायके की तरफ का कोई आ जाय तब इनकी अमीरी देखिए, अच्छे-अच्छे लखपतियों के घर का खाना लजा जायेगा। उन दिनों पत्रिकाओं से विशेष अच्छी-अच्छी व्यंजन विधियां निकालती हैं, और जितने दिन भी कोई रहता है सिर में किसी के दर्द तक नहीं होता है।
तो ठुमुक कर बोली, मेरी वो नीली वाली साड़ी है न वह फट गयी है ,पर उसमें लगी फाल साबुत है । सोच रही हूँ फाल बेकार जायेगा, इसलिए एक दूसरी नीली साड़ी ले डालूँ काम आ जायेगी।’ है न जबरदस्त मितव्ययता।
अब मैं जल्दी से लिखना समाप्त करता हूँ। डर है कहीं इधर उधर से आकर देख न लें और यह कहकर फाड़ न दे कि क्यों बेकार कलम घिस रहे हो। टिकट के पैसे भी बेकार जायेंगे। क्योंकि उनके लिए हमारा सब लिखना बेकार ही तो है ,और उसे बचेकर रद्दी के पेैसे वसूल करती हैं।