Friday, 4 December 2015

एक चिराग उन्हें भी मिला भाग 3

मेरी अक्ल साफ हो गई कुछ जबाब देने से पहले सोच लेना जरूरी था, इस समय मेरा एकएक शब्द कीमती था। मुझे चुप देखकर पांचों बोले, कहिये साहब चुप कैसे हैं। इधर ये भूत उधर माँ के सिर पर चढ़ा भय का भूत। क्या करूँ एकाएक ख्याल आया कि क्यों न बेवकूफ बनाकर काम निकाला जाये, इसलिये कहा, जनाब मैं हैरान हूँ कि आप लोग कह क्या रहे है मुझे तो कोई नवीनता नहीं नजर आ रही है।


मैं तो इन महान मालिक महोदय के टूटे फूटे मकान में बैठा हूँ ,पता नही सबको क्या हो गया है। छत की हालत आपको दिखाई नहीं दे रही है ये जगह जगह से टूटा फर्श, अब क्या कहूँ मुझै तो आप लोगों पर संदेह हो रहा है कहीं आप लोग पागलखाने से तो नहीें आये है और बन रहे है अधिकारी।


’अब तक मैं परेशान था अब वे आंखे फांड़ फांड़ कर मुझे देख रहे थे शायद वो सब मुझे पागल समझ रहे थे फिर मकान मालिक गुर्राकर बोला, हमें बेवकूफ बनाने की कोशिश मत करो चुपचाप इस हवेली से उठकर नौ लाख की हवेली में चलो। अब कहाँ नौ लाख की हवेली अब तो करोड़ो में भी नही बनेगी पर कहेंगे नौ लाख की हवेली।



मैने हंसते हुए कहा, मेरी समझ में नही आता आप लोगों को क्या हो गया है लगता है इस स्थान परभूत प्रेतों का साया आ ही गया है तब ही ये नये नये तमाशे हो रहे हैं ’ ‘ अच्छा तो अब अपने काले धन को भूत धन ठहराना चाह रहे हैं ?’व्यंग्य से भ्रष्टाचार निरोधक बोले।



दूसरे महोदय भभक कर बोले, ‘एक तुमहारा ही दिमाग सही है और हम सब पागल है ,अगर वह झाड़ नहीं झाडू लटक रही है बड़े बड़े दीवार के बराबर आइने लगे हैं तो हम तुम्हारी आंखों में देख रहे है। क्यों ? बड़ी बड़ी आइल पेन्टिग ? सब हमारा भ्रम है एक साथ हम सब का।’



‘साहब छत पर झाड़ नहीं जाले लटक रहे हैं दीवार पर पेन्टिग नहीं पहले किरायेदार के बच्चों द्वारा बनाई गई आड़ी तिरछी लाइनें हैं, अब आप समझ सकते है उन मकान मालिक महोदय ने सात साल से सफेदी नहीं कराई है और पता नहीं पहले से कब की हो रही है। ’मैने दीवारों को घूरते हुए ध्यान दिया वास्तव में पेन्टिग तो कमाल की है पता नहीं कहां कहां से उड़ाई होंगी जिन्न ने कल एक लफड़ा और न खड़़ा  हो जाये।



उन सबको बाहर से घर दिखाने के लिये लेकर गये मकान मालिक की अनुपस्थिति का लाभ उठाया और तुरंत जिन्न से पहले जैसा घर करने के लिये कहा। पल भर में फिर दीवार चूना झड़ती दिखाई देने लगी। लौट कर वापस अंदर आये तो कुछ देर हकबकाये से देखते रहे फिर चुपचाप वापस चले गये।



चलो न सही महल में रहना अब हाथ आये इस खजाने का इस्तेमाल कैसे करे ?


 कहीं और भी कहेंगे तो जमीन का लफड़ा पड़ेगा नगद नारायण वह ला नहीं सकता था। सोना लाने पर स्मगलर ठहर जाते, एक बार नगद लाने की कही तो न जाने कहां की मुद्रा उठा लाया । फिर सोचा चलो दुनिया की सैर की जाये और उसके लिये जिन्न महोदय ने, एक कालीन ला दिया ।


अब कालीन पर हम बैठे और अपने को गिरने से बचाये कि दुनिया देखें। कार मंगाई तो वह पुराने जमाने का रथ उठा लाया जो महज अजायब घर की चीज थी बिना लाइसेंस तो वह भी हमारे लिये बेकार था पुरातत्व वाले धर लेते। अब एक साइकिल मंगा कर उस पर चल रहे हैं।
एक चिराग उन्हें भी मिला
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