Wednesday, 9 December 2015

आउट आॅफ डेट की संस्कृति

दक्ष प्रजापति कन्या पार्वती का दुर्भाग्य था कि वो ऐसे काल में अवतरित हुई जब मायके जाने के लिये आज्ञा पर आज्ञा लेनी पड़ती थीं।


आज के युग में रही होती तो किसी से कहने की तो बहुत भलाई सीधे जीन्स पहनकर बाॅबकट बाल और बगल में लटकते थैले में पितृघर से हविष्यान्न बटोर कर कहती पाॅप थोड़ा और भेज देना शैवी के सब फ्रेंडस् भी हैं। उन्हें कहाँ फुरसत है


और देखना अगर आपके स्टाक में और गांजा वांजा हो तो वो भी भेज देना, शैवी को शौक है न , और हिप्पी संस्कृति में अपने पति पर गर्व करती माता बहनों को पुरातन पंथी कहती हिकारत की दृष्टि से देखती, वह जा और वह जा और बहने माता अपने को आउट आॅफ डेट पाकर पार्वती के सौभाग्य से जलभुन वहीं अपने को अग्नि में समर्पित कर देती।

आउट आफ डेट है माताजी पिताजी क्योंकि अब वे ममी मृत मसालों से सुरक्षित लाश है। यह नियति है इस से ज्यादा उनका आस्तित्व नहीं और पिता भी उनके सामने जीवित होते हुए डैड हैं।



डैड बोलते नहीं उन्हें गिनता कौन है ज्यादा बकवास नहीं, हम आज की संस्कृति हैं, आप आउट आॅफ डेट हैं।आउट आॅफ डेट हैं प्रसाद जो छिल छिल कर छाले मृदुल चरणों से फोड़वाते हैं।



अरे विवाई भरे खुरदरे पांव, पेंसिल हील वाली सैंडिलों में लिपटे खटाखट छालों को फोड़ते चले जायेंगे और सीधे पहुंचेंगे केशव के पास जो तब तो रो रहे थे अब तो उनका सौभाग्य होता।



ब्यूटी पार्लर से तरह तरह के लोशनों से पुत कर चंद्रबदन की तरह चमकती मसकारे और मृग लोचनों की नकली पलकें लगाये, सीधे उनसे बाबा नहीं हाय! बाब, हाय! बाॅब कहकर लिपट जाती क्योंकि उन्हें मालुम होता कि केशव राजदरबार कवि हैं।



राजदरबार का कुत्ता भी यानी राजनीति में चस्पा हर आदमी का बैंक वैंलेंस तो बस होता ही कई शून्यों में है। फिर जितने ज्यादा सफेद बाल उतनी कन्याओं की चांदी क्योंकि जल्दी पार लग जायेगा।



आउट आॅफ डेट है प्रेमचंद और जो पैसे मिलने से अलाव में आलू ही भून कर खाते रहे। हम को भी प्रेमचंद स्टाइल में अंतिम पंक्ति में कहानी को ला पटकने का शौक चर्राया अखबार में पढ़ी लाखों की खरीद फरोख्त की खबर। सारी जिन्दगी मेहरारू से काम करवा कर उसकी लाश बिकबायी। 





हाथ में चमचमाते सिक्के दिखाकर रोते दिखाया  नायक को। एक जगह से कहा गया प्रेमचंद का प्रभाव है एक स्थानीय पत्रिका के संपादक ने कहानी मांगी तो कहा गया टालस्टाॅय का प्रभाव, सिर गर्व से ऊँचा हो गया। वाह कितने टाॅप के क्लासिकल लेखक बन चले हम तो ।


खैर प्रेमचंद तो बचपन में पढ़े थे पर टालाटाय तो युद्ध और शांति से अधिक पढ़ नहीं पाये थे। आंख झपका कर पूछा, तब तो रचना उच्चकोटि की फिर छापने में क्या ऐतराज है नकल तो नहीं है न ?


‘नहीं जी, नकल तो नहीं है ,’ मुँह लटकाए संपादक जी बोले, ‘लेकिन अब ऐसी कहानियाँ कहाँ चलती है, ये तो आउटआफ डेट हैं।’ मतलब अब गरीबी आउट आॅफ डेट है।


हाय न हुए वे इस युग में नहीं तो उनको भी मेहरारू के मरने का गम गलत करने के लिये नायक को पांच सितारा होटल में ले जाना पड़ता और टन्न होकर सुन्दरी का डांस देखते टेबुल पर ही लुढ़काना होता।
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