Friday, 18 December 2015

मेरी पुर्नशिक्षा

कुछ साल से मुझे अपना बचपन नित्य याद आता है। कभी कभी तो इतनी शिद्दत से याद आता है कि मैं बहुत साल पहले अपने छोटे से शहर की गलियों में पहुंच जाती हूँ


जहाँ बरसात होने पर पुरानी काॅपियों के कागज फाड़ फाड़ कर नाव बनाया करते और देखते बाजार के मोड़ तक किसकी नाव पहुँचती है। मोड़ पर नाली का भंवर बनता । उसे कोई नाव पार कर जाती कोई फंस जाती। जिस बच्चें की नाव पार कर जाती उसकी छाती चैड़ी हो जाती।


मैं बचपन को बुला रही थी बोल उठी बिटिया मेरी, ‘मम्मी होमवर्क कराइये न’उफ! मैं तो बरसात में खोई थी तुमने मुझे कहां ला पटका।’ मैं अभी भी रोमांटिक मूड में थी।‘ मम्मी अगर हमने होमवर्क नहीं किया तो जो बरसात हमारी आंखों में होगी वह आपसे संभले नहीं संभलेगी।’ ‘


हाँ तुम सही कह रही हो बच्ची, पर तुम्हारे भाग्य में वह सुख कहाँ’’ एक दीर्घ निश्वास के साथ बड़े बड़े पोथों में से पढ़ पढ़ कर बिटिया का होमवर्क कराने लगी। अल्पी की सिक्स्थ की और बेचू की फोर्थ स्टैन्डर्ड की पढ़ाई देखकर अपनी एम.ए. पी. एच. डी की पढ़ाई बौनी लगने लगती है।


इन लोगों की उम्र में तो हम कुद्दकड़े लगाते फिरते थे। हमारी घोटामार पढ़ाई थी, पंडितजी आ जाते घोट घोट कर पट्टी बुतके से अ आ इ ई पढा जाते। गा गा कर दो एकम दो याद कर लेते।


कहां इनका लदा फदा बोझा, गाड़ी भर किताबें, बैग भर रुपये के साथ अपनी चार आने की पहाड़े की किताब याद आती है। हमारी चार आने की किताब चालीस तक पहाड़े, इकाई दहाई, सैकड़ा, मन सेर छंटाक, मील, सब समेटे बैठी थी और दस पेज की बीस तक टेबल वाली बुक जा लगाकर सौ रुपये कीमत की ऊँचाई पर जाकर बैठ गई।


गुणा जोड़ बाकी सीधा साधा हिसाब न जाने कौन-कौन से नये चिन्ह और बड़े बड़े शब्द लेकर आ गये कि बच्चों के आगे मुँह छिपाना पड़ जाता है। साइंस में एडीसन मारकोनी आदि जरा जरा सा पढ़ा वह भी ऐसे याद किया कि जिसे कोहनी मारने की आदत थी उसे मारकोनी कहते है।


मेरी पुर्नशिक्षा का अगला भाग
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