Wednesday, 16 December 2015

जरा बता कर मरते

‘अजी सुनती हो... पड़ोस के मेहरा जी चले गये’ हड़बड़ाये से शंकर जी घुसे तो देखकर चकरा गये जैसे तूफान गुजर कर गया हो सारे कपड़े आलमारी से निकले पड़े थे उनके बीच श्रीमती जी सिकुड़े हुए सूट को हाथ में लेकर सिर धुन रही थी।


‘अरे! क्या बात हुई यह सब क्या है ?’ शंकर जी घबड़ा गये

‘कब से कह रही थी ,सफेद सलवार कमीज या साड़ी लानी है पता कब कौन गुजर जाये पर तुम हो कि सुनते नहीं अब क्या पहन कर जाऊँ ? अब इधर बहुत दिन से कोई मरा भी नहीं मैंने भी ध्यान नही दिया,। एक सूट सामने वाले धीरेन्द्र जी गये थे तब लाई थी अब ये तो छोटा हो गया होगा।


‘अरे ! यह छोडा़े अब चलो सब पहूँच चुके हैं ,हम ही नहीं गये हैं।’ ‘नहीं ,नहीं ऐसे, नहीं जाऊँगी ,आजकल यही चलता है। मुर्दनी का शो बिगड़ जायेगा ’’ ‘इसका भी ड्रेस कोई है’


‘बिलकुल, सफेद साड़ी या सलवार सूट और काला चश्मा। काला चश्मा तो है ,पर अबकी बार नये फैशन का लाऊँगी ,अब इनका उठाला होगा तब पहनूँगी। तुमने देखा नहीं जितने भी नेता या बड़े आदमी गये उनके
घरवाले बड़े बड़े कालेे चश्मे लगाये थे।


अब तुम सीरियल और फिल्में नहीं देखते ,जिसमें चाहे जवान बेटा मरे या पति, सुसर मरे या बाप पहले एकदम भारी कपड़े पहनती हैं अब अपनी किस्मत कहाँ इतने जेवर कपड़े पहन कर घर में घूमने की। वो तो सोती भी ऐसे ही जेवर कपड़े पहन कर यहाँ तो घिसा पिटा सूट या गाउन पहनने को मिलता है। जैसे ही कोई मरता है रोने की जगह पहले सफेद कपड़े पहनने दौड़ते हैं।


कितना भव्य और शानदार लगात है सब एकदम नये नये झकाझक सफेद कपड़े और काला चश्मा लगा कर बैठे होते हैं क्या मजाल है एक भी दाग हो।


मैंने तो सारे डिटर्जेट आजमा लिये पर मरा घिस घिस का धोकर भी तो इतना सफेद नहीं हो पाता था, अब रखा रखा ओर पीला पड़ गया है। अब तो चलो चलती हूँ। पर आते ही दो तीन सूट साड़ी और काला चश्मा खरीदने चलना है।

बहुत खराब लगेगा मेरी वजह से उनका सारा शो खराब हो जायेगा।तुम भी सफेद कुर्ता पाजामा बनवा लो, अब मेहरा जी भी जरा बात कर मरते तो अच्छा नहीं होता चला ?
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