Saturday, 21 November 2015

दूरदर्शिनी महाभारत जारी है...

पिछला भाग- दूरदर्शिनी महाभारत


बहुत आदर से सम्मान से मैंने गौ माताजी को प्रणाम किया और हाथ जोड़ कर विनम्र विनती की माताजी जरा रस्ता छोड़ दो , तो मैं आगे निकलूँ तुम हमारी पालनहार हो लेकिन तुम्हारे इन सीधे सीगों से और जोर से सिर हिलाकर पीछे दौड़ने से बहुत डर लगता है। मैं अकिंचन नादान, मेरी काया में नहीं है दम, पैर दे गये हैं जबाब, दौड़ नहीं सकती, इसलिये हे! माताजी आप जरा सी अपनी काया को सरका लीजिये।


लेकिन व्यर्थ मेरी प्रार्थना नहीं सुनी और पतली गली में दीर्घ काया के साथ मुझे घूरती आगे बढ़ती रहीं। मुझे वापस दौड़ कर घर में घुसना पड़ा तो माताजी समझी मैं उन्हें मार्ग दर्शन कर रही हूँ ,और मेरे पीछे मेरे घर में घुसकर रखे, गमलों के फूलों को उदरस्थ करती रहीं । मै लाचार उनके पेट की भूख को शांत होते देखती रही क्योंकि मुझे मेरा कर्तव्य याद था। भूखे की भूख शांत होने देना, उनके प्रति दया दिखाना न कि डंडा दिखाना यही है जीव दया। मैं अपने ही घर में कैद थी जब माताजी मुँह घुमा घुमा कर कोचिया के पौधों को घास समझकर खा चुकी, तब वहीं आराम के लिये बैठ गई। अपना जाना स्थगित कर उनके जाने की वाट देखती रही । अतिथि तुम कब जाओगे। हे! मातृशक्ति मुझे शक्ति दो और मैंने प्रार्थना की तो उन्होंने ढेर से गोबर का प्रसाद और गोमूत्र का अमृत जल प्रदान कर दिया खाओ पीओ और मस्त रहो और मंथर गति से चली गई।


बंदर नहीं कहो, हम तुम्हारे पूर्वज हैं। हमें कष्ट मत देना। तुम्हारे घर से सामान लेना, फ्रिज में से फल निकाल कर खाना और अगर बच्चे हमारे बीच में जरा भी दखल दे तो उन्हें घुड़की देकर दौड़ाना हमार परम कर्तव्य है। अब इसमें हमारे पूर्वजों का क्या दोष है कि आप उनकी घुड़की से इतना डर जायें कि मुंडेर से गिरकर नीचे सड़क पर आ गिरे और हाथ पैर तुड़वा बैठे या हमारे भी पूर्वजों से जा मिले इसमें हमारी कोई गलती नहीं है हमें डंडा दिखाने की भी जुर्रत नहीं करना।

हमारा मन करता है कपड़े पहनने का तो उठा लेते हैं, तो रोते क्यों हो ? क्या अपने पूर्वजों को कपड़े भी नहीं पहनाओगे ? छत हमारे लिये है। तुम्हारे बच्चों के लिये कमरे हैं। हमें छत पर तो रहने दो, यह तो होता नहीं है हमारे लिये एक कमरा एसी लगवा कर बनवा दो जिसमें आराम से लेट सके, वो हम गुस्सा भी न हों। अब हमारी घुड़की ,बंदर घुड़की नहीं है । अब हमसे डरो, नहीं तो जेल जाओगे। बहुत हमें पकड़ कर लैब में परीक्षण कराये हैं। अब हमारी नस्ल बढ़ रही है बढ़ने दो ,परिवार नियोजन तुम्हारे लिये है।  हमारा साम्राज्य तो निरंतर बढ़ रहा है,बढ़ेगा और बढ़ता रहेगा जलभुन कर खाक मत हो।


कुत्ते जी हम पर अलग घुरघुराते हैं। मुझे कुत्ता कहने की हिम्मत मत करना मुझे डाॅगजी कहो, कुत्ते तो अब तुम खुद हो। बनते इंसान हो पर जिदंगी हम पशुओं की जीते हो। जवानी में बीबी एक मिनट में उल्लू बना देती है प्रौढ़ावस्था में गधे की तरह बोझा ढोते हो और अंत में मेरी बिरादरी में आ मिलते हो टुकड़ा मिल जाये तो खा लो, नहीं तो सिकुड़ कर पड़ो एक कोने में। इसलिये मुझे देखो और अपना अंत देखो। इसलिये मेरी अच्छी देखभाल करो मुझे प्यार से बुलाओ, सहलाओ। मैं काटूँ तुम धावक की तरह भागो नहीं। छड़ी लेकर घूमना बंद करो। मेरे बहुत हिमायती हैं। मेरे दांतों में खुजली हो और जरा सा काट लूँ, इससे डरते हो। अरे! इंजेक्शन लगवाओ सरकार इसीलिये देती है पर मुझे कुछ मत कहना, खबरदार मुझसे डर के रहो नहीं तो मैं भी गाली दे दूँगा ‘


हमारे सनातन धर्म पिता श्री श्री 108 श्री सांड महाराज का जब कभी मन आता है पूरी सड़क पर अपना साम्राज्य जोड़कर बैठ जाते हैं। जब कभी वह रंग महल हो जाता है क्या मजाल किसी की हिम्मत जो उन्हें छेड़ जाये,


अपने प्रतिद्वंदी को बीच चैराहे पर घेरते हैं और पांडव कौरव की सेना की तरह आमने सामने सींग से सींग भिड़ाकर खड़े हो जाते हैं और कहते हैं, बच्चा धीरज धरो हमें देखो अखाड़े में पहलवानों के लिये जुड़ते हो, हम भी पहलवान हैं सूमो पहलवान हैं, वो भी बिना किसी बैरीकेटिग के। जिधर चाहे प्रतिद्वंदी को खदेड़ दें। यह अब तुम्हारी समस्या है वही क्यों खड़े हो हम तो चलेंगे, लड़ेंगे। सड़क हमारी हमारे बेटों की। आखिर हम तुम्हारी पूज्यनीय माताजी के पति हैं, क्या मजाल तुम्हारी कि तुम हमें मवेशी खाने भेज सको। हमारी जब इच्छा होगी तुम्हें उठाकर पटकेंगे, झटकेंगे लटकायेंगे। तुम क्या तुम्हारी औकात क्या ? सही है हम आपसे कहां कुछ कह सकते हैं साड़ जी। आप सबके आगे हम तुच्छ प्राणी है। आप सब पूज्यनीय हो । आपको न हम काट सकते न घुरघुरा सकते , न घुड़की दे सकते ,न हमारे सींग है कि हम उछाल दें । हम निरीह प्राणी आप हमारे भाग्य विधाता है। आप चुनाव में चिन्ह के रूप में हमारी उपस्थिति का आभास दिलाते है आप की जय है।
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