Friday, 13 February 2026

Khushi

 चिरस्थायी ख़ुशी के लिए करने योग्य तीन चीज़ें

ख़ुशी पूर्तिण् प्रचुरताण्

हम मनुष्य हमेशा चेतना की उस अवस्था के लिए उत्सुक रहते हैं जिसे हम श्जीवन संतुष्टिश् को दर्शाने के लिए अपने पसंदीदा प्लेसहोल्डर वाक्यांश के साथ लेबल करते हैं। यूईएफ मेंए हमारा पसंदीदा फल.फूल रहा है। ष्फूलष् शब्द से संबंधितए फलने.फूलने का अर्थ है कि हम अपनी पूर्ण क्षमता की स्थिति में खिल जाएं। एक फूल अपनी पूरी क्षमता से तब तक खिलता है जब तक उसे सही अनुपात में पर्याप्त धूपए पानी और हवा मिलती है। और एक फूल अपने आप में खुश है . एक गुलाब गेंदा नहीं बनना चाहता। फलने.फूलने को स्थायी खुशी की स्थिति के रूप में भी समझा जा सकता हैए जो कि क्षणभंगुर खुशी की सामान्य खोज के विपरीत है जो हमेशा बाहरी वस्तुओं पर निर्भर होती है। सच्चा सुख चिरस्थायी होना चाहिएय एक बार प्राप्त होने पर यह हमेशा वहाँ रहना चाहिए।

तो वास्तव में फलने.फूलने के लिए हमें क्या चाहिएघ् विश्वास करें या न करेंए उत्तर आपके विचार से कहीं अधिक निकट हो सकता है . और जब हम बच्चों का निरीक्षण करते हैंए तो उनके फलने.फूलने की आधारशिला आश्चर्यजनक रूप से सरल होती है।

मैं हमेशा छोटे बच्चों को खेलते हुए देखकर मंत्रमुग्ध हो जाता हूँ। वे इस पल में पूरी तरह व्यस्त हैंए वे पूरी तरह डूबे हुए हैंए बिना इस बात की परवाह किए कि कौन देख रहा होगा। वे अपनी भावना या स्नेह दिखाने में कभी नहीं हिचकिचातेए इसे निर्बाध रूप से बहने देते हैंए चाहे खुशी से गले लगाकर या जोर से हंसकर। जिज्ञासा के ये बंडल छोटे स्पंज की तरह काम करते हैंए जो कुछ भी उनके सामने प्रस्तुत किया जाता हैए या जो कुछ भी वे खोजते और खोजते हैं उसे सोख लेते हैं। एक फूल की तरह जिसे पूरी तरह से खिलने के लिए हवाए पानी और सूरज के सही संतुलन की आवश्यकता होती हैए बच्चे केवल प्यार करनाए सीखना और खेलना चाहते हैं . और जब वे इन तीन आवश्यक गतिविधियों में संलग्न होते हैं तो वे फलने.फूलने की स्थिति में होते हैं। और क्या होगा अगर हम भी प्यारए सीखो और खेलो या एलएलपी को प्राथमिकता देंघ् शायद हम भी खिल उठेंगेण्


Thursday, 12 February 2026

Sarvbhaom ek ishwar

   केवल एक सार्वभौमिक ईश्वर 

कुछ लोग ईश्वर शब्द के किसी भी वैध उपयोग से इनकार करेंगे क्योंकि इसका बहुत दुरुपयोग किया गया है। निश्चित रूप से यह सभी मानवीय शब्दों में सबसे बोझिल है। ठीक इसी कारण से यह सबसे अविनाशी और अपरिहार्य है। 1ऋ 

                                                                   . मार्टिन ब्यूबर 

सभी आस्तिक धर्मों मेंए चाहे वे बहुदेववादी हों या एकेश्वरवादीए ईश्वर सर्वोच्च मूल्यए सबसे वांछनीय अच्छाई का प्रतीक है, इसलिएए ईश्वर का विशिष्ट अर्थ इस बात पर निर्भर करता है कि किसी व्यक्ति के लिए सबसे वांछनीय अच्छा क्या है। 2 

                                                                    .एरिच फ्रॉम 

मुझे याद है भारत में जब स्टैनफोर्ड बिजनेस स्कूल के मेरे सहपाठीए डैन रूडोल्फए जो उस समय स्टैनफोर्ड बिजनेस स्कूल के मुख्य परिचालन अधिकारी थेए अपने परिवार के साथ कैलिफ़ोर्निया से मुझसे मिलने आए थे । । उनकी दो बेटियाँए क्रमशः सात और नौ वर्ष कीए जिनका पालन.पोषण एक कट्टर ईसाई परिवार में हुआए हिंदू पौराणिक कथाओं से काफी आकर्षित हुईं। 


1 मार्टिन बूबरए आई एंड तू ;न्यूयॉर्करू साइमन एंड शूस्टरए 1996द्धए 123.24। 

2 एरिच फ्रोमए द आर्ट ऑफ लविंगए फिफ्टीथ एनिवर्सरी एडिशन ;न्यूयॉर्करू हार्पर कॉलिन्सए 2006द्धए 


वे छोटी.छोटी मूर्तियां घर ले गईं, लक्ष्मी ;धन की देवीद्धए सरस्वती ;ज्ञान की देवीद्ध और गणेश ;सौभाग्य के देवताद्ध। बाद में एक दिनए जब एक बेटी कैलिफ़ोर्निया में स्कूल जा रही थीए तो उसकी माँ ने उत्सुकता से उसे परीक्षा के लिए शुभकामनाएँ दीं। उसने अपनी माँ को उस खुले दिलए चंचल आत्मविश्वास से आश्वस्त किया जो छोटे बच्चे अक्सर प्रदर्शित करते हैंरू श्माँए चिंता की कोई बात नहीं है। मेरी एक जेब में गणेश और दूसरी जेब में सरस्वती हैं इसलिए मेरा पूरा ख्याल रखा जाता है!श्

अपनी मासूमियत मेंए और बच्चों के रूप मेंए हम बहुत आसानी से और स्वाभाविक रूप से विभिन्न धर्मों और पौराणिक कथाओं की अवधारणाओं को अपने जीवन में शामिल कर सकते हैं। मेरा जन्म पुरानी दिल्ली में हुआ थाए जो आज भी दुनिया के सबसे धार्मिक बहुलतावादी स्थानों में से एक है। एक बच्चे के रूप मेंए मैं कई धर्मों की जीवंत परंपराओं से परिचित हुआ और विभिन्न धर्मों की विविधता और समानताओं से आकर्षित हुआ करता था। वयस्कता मेंए इन समानताओं को अधिक पाठ.आधारित धार्मिक साक्ष्यों के माध्यम से सुदृढ़ किया गया क्योंकि मैंने सभी प्रमुख धर्मों के धर्मग्रंथों को अधिक बारीकी से देखा। प्रारंभ मेंए यह पाठ मुझे मेरे माता.पिता की शिक्षाओं और ऋग्वेद के एक विशेष ष्ष्लोक अंश के माध्यम से मिलारू श्एकम सत् विप्रा बहुदा वदन्तिश् ;सत्य एक हैए लेकिन बुद्धिमान लोग इसे कई के रूप में जानते हैंद्ध।1 यह इस में प्रतिध्वनित है। कुरानए जो पुष्टि करती है कि एक ही सत्य श्मठोंए चर्चोंए आराधनालयों और मस्जिदों में बोला जा रहा हैए जहां भगवान के नाम का प्रचुर मात्रा में स्मरण किया जाता है।श् 4 इसी तरहए सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक ; पच्चीस करोड़ अनुयायियों के साथ दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा धर्मद्धए सिखाया गया किए श्एक ईश्वर हैए जिसका नाम सत्य हैए निर्माताए बिना किसी डर केए बिना नफरत केए कालातीत रूप मेंए जन्म से परेए स्वयं विद्यमानए गुरू की कृपा से जाना जाता है 

Akhil Gupta  ki pustak se 

Sunday, 21 September 2025

brij ke bhajan

 83प्राणी भजले राधेश्याम काम तेरे कोई न आवेगो 

बना एक कुदरत रूपी ख्याल लपेटो ऊपर माया जाल

भव सागर में पड़ो पड़ो नर गोता खावेगो प्राणी .................

पिता माता भ्राता सुत नारि छोड़ दे अब तू इनको साथ 

जा दिन सुआ उठे संग तेरे कोई न जावेगो प्राणी 

भजन कर हरि को वारम्वार मिले तोहे निश्चय मदन मुसीर 

कर मन सोच विचार हाथ मल मल पछतावेगो प्राणी 

करम कहु पिछले करि आयो देह जासे मानस की पायो 

लख चोरासी भोग जनम तू ब्रथा गावावेगो प्राणी ................


84दहि माखन न लूटो हमार मै नई ग्वालनियाँ 

तुम ग्वाल वाल झूठे गालियों मे घूमते 

तकते पराई नरिया नथना सिकोडते 

तुम हो तो बड़े ही गवार मैं नई ग्वालिनिया 

तुम चीर ले के मेरा कदम्ब पै चढ़ गये 

जब चीर अपना माँगती नयना सिकोड़ते 

तुम होतो बड़े होशियार मैं नई 

मैं जाकर कहूँ कंस से तुम पकड़े जाओगे 

गाना बजाना नाचना सब भूल जाओगे 

वहाँ शेखी न बलिय तुम्हार मैं ...............


85शरण में आये है हम तुम्हारी दया करो है दयालु भगवन 

सम्हालो बिगड़ी दशा हमारी दया करो  हे   दयालु भगवन 

न हममें बल हे न हममें शक्ति न हममें साधन न हममे शक्ति

तुम्हारे दर के हैं हम भिखारी दया करो है दयालु भगवन 

जो तुम हो स्वामी तो हम हैं सेवक जो तुम पिता हो तो हम हैं बालक

जो तुम हो ठाकुर तो हम पुजारी दया करो हे दयालु भगवन 

सुना है हम अंश हें तुम्हारे तुम्हीं हो सच्चे प्रभु हमारे 

यह है तो तुमने सुधि क्यों विसारी दया करो हे दयालु भगवन 

प्रदान कर दो महान शक्ति भरो हमारे में ज्ञान भक्ति

तभी कहाओगे ताप हारी दया करो हे दयालु भगवन 

न होगी जब तक दया की दृष्टि न होगी तब तक दया की वृष्टि 

न तुम हो जब तक न्याय कारी दया करो हे दयालु भगवन 

हमें तो बस देर नाम की है पुकार बस राधे श्याम की है 

तुम्हारी तुम जानो निर्विकारी दया करो है दयालु भगवन 


86भारत में फिर से आजा गिरवर उठाने वाले 

सोतो को फिर जगाजा गीता के गाने वाले 

गूंजा था जिससे भारत नाचा था जिससे त्रिभुवन 

वह तान फिर सुनाजा वंशी बजाने वाले 

दुख द्वन्द बढ़ रहे हैं दुकाल पड़ रहे हेैं

फिर कट सब मिटाजा गऊये चराने वाले 

है राधे श्याम निर्बल जन तेरे भक्त वत्सल 

बिगड़ी को फिर बनाजा बिगड़ी बनाने वाले 


87सुना है तारे हैं तुमने लाखों हमे जो तारो तो हम भी जाने 

उबारा गजराज ग्राह से है हमें उबारो तो हम भी जाने 

निशाचरों को सहारा तुमने उतारा पृथ्वी का भार तुमने 

हमारे सिर पर है बोझ भारी उसे उतारो तो हम भी जाने 

हस अहिल्या का शाप तुमने मिटाया शवरी का शाप तुमने 

हमारे भी पाप हाय भगवन अगर निवारो तो हम भी जाने    

88अगर भगवान के चरणों में मेरा प्यार हो जाता 

तो इस संसार सागर से मेरा उद्वार हो जाता 

न होती जग में यह खारी न होती जग में कर्म बीमारी 

जमाना पूजता सारा गले का हार हो जाता 

रोशनी ज्ञान की खिलती दीवाली दिल में हो जाती 

ह्नदय मन्दिर में भगवन का दीदार हो जाता

परेशानी न हैरानी दशा हो जाती मस्तानी 

धर्म का प्याला पी पीकर मेरा बेड़ा पार हो जाता 

जमा का विस्तरा होता न चादर आसमा बनता 

मेरे ह्नदय पर ही घनश्याम का घट वार हो जाता 

चढ़ाते भक्त हे तेरे चरणा की धूल मस्तक पर 

तो उम्र की भक्ति में ये मन मेरा एक तार हो जाता 

अगर है राम को जपना ह्नदय की एक भक्ति से 

तो तेरा घर भी भक्तों के लिये दरबार हो जाता 


Sunday, 7 September 2025

pchas hajar sal pahle

 पचास हजार पहले


यद्यपि विज्ञान ने इतनी तरक्की की है कि इंसान चांद पर जा पहुँचा है, परख नली शिशु उत्पन्न हो रहे हैं, अर्थात प्रकृति के कार्यों पर, उसकी रचना पर मानव अधिकार करना चाहता है। लेकिन फिर भी पृथ्वी पर जीवन का आरम्भ कैसे हुआ नहीं जान पाया है। जीवन का आरम्भ जैली के से नन्हें कण से हुआ या किसी और तरह से यह केवल अनुमान मात्र है।

पहले जीवन कैसा था, वैसा ही था जैसा आज है या किसी अन्य रूप में था बहुत से प्रश्न उठ खड़े होते हैं जिनमें से कुछ के उत्तर प्राणियों के प्राप्त जीवाश्मों से ज्ञात होता है।

सबसे पुराना जीवाश्म पचास करोउ़ वर्ष पुराना है। ये जीवाश्म पत्थर पर पड़ी छाप, हड्डियाँ या बर्फ में दबे कंकालों से बने हैं। पत्थर पर या अन्दर जमीन पर जीव की अनुकृति छप जाती है और जीव मिट्टी बन जाता है। इसी प्रकार कहीं-कहीं ऐसे विशाल प्राणियों के जीवाश्म प्राप्त हुए हैं या बिखरे कंकाल प्राप्त हुए है जिन्हें जोड़ने से विचित्र प्राणियों के आस्तित्व  के विषय में आधार बना।

अधिकतर जीवाश्म बलुआ मिट्टी में पाये जाते हैं। बालू एवं अन्य पदार्थ जब एक जगह एकत्रित होकर कठोर हो जाती है तब उसके अन्दर पड़ा पदार्थ भी उसी अवस्था में पत्थर बन जाता है। इसी प्रकार जब बालू मिट्टी पर पड़े जीव पर मिट्टी पड़ जाती है और कठोर हो जाती है तब जीव का जीवाश्म प्राप्त हो जाता है।

समुद्री जीव मरकर समुद्र में डूब जाता है पृथ्वी पर होती उथल-पुथल में कभी समुद्र का हिस्सा ऊपर उठ जाता है और उसमें पेड़ पड़े मृत पदार्थ जीवाश्म के रूप में ऊपर आ जाते हैं।

कुछ जीवाश्म जीव के ही पत्थर बन जाने पर प्राप्त होते हैं पत्थर पर पड़े मृत जीव पर पानी पड़ पड़कर उसका मांस मज्जा बह जाता है और तरह-तरह के रासायनिक पदार्थ उस पर पड़-पड़कर उसकी आकृति कठोर हो जाती है। कभी-कभी रासायनिक पदार्थ एकत्रित नहीं होते लेकिन खाली ढांचे का आकार मात्र रह जाता है। इससे जीव की आकृति ज्ञात हो जाती है। कभी-कभी पूरा जीव बर्फ में हजारों साल बाद भी दबा मिल जाता है।

सबसे पुराना जीवाश्म पचास करोड़ वर्ष पुराना है। ये जीव बिना मेरुदंड वाले थे। रीढ़ वाले जीव बाद में धीरे-धीरे बने। इनका विकास भी इसी क्रम में हुआ रीढ़ बनने के साथ इनमें पंख, डैने आदि विकसित हुए और प्रजातियाँ बनीं। मछलियों के शरीर में फेफड़े विकसित हुए और कई करोड़ वर्ष बाद प्रलय होने के बाद मछलियाँ सृष्टिकर्त्ता बनीं और विभिन्न जलचर उभयचर की उत्पत्ति हुई। ये जल और थल दोनों पर समय बिताते थे। दस करोड़ वर्षों तक पृथ्वी पर राज्य करने के बाद यह जीवन भी समाप्त हुआ और डायनोसोर का जमाना आया। डायनोसोर का अर्थ है भयानक छिपकली लगभग बीस करोड़ वर्ष तक इनका साम्राज्य रहा और पृथ्वी को हिलाते कंपाते रहे। ये सरीसृप प्रजाति के थे।

रीढ़ की हड्डी वाले जानवरों में मछली चिड़िया और स्तनपायी जानवर आते हैं और बिना रीढ़ वालों में रेगने वाले प्राणी। ये जीव रीढ़ की हड्डी रहित अवश्य थे लेकिन आजकल के रीढ़ की हड्डी रहित जीवों की भांति मात्र सरकने वाले जीव नहीं थे। इनका पभ्ठ का हिस्सा आम चौपायों की तरह धरती से ऊपर उठा रहता था।

अधिकांश डायनोसोर विशाल आलसी और शाकाहारी थे। डायानोसोर जाति का सरीसृप संभवतः तब का और अब का भयंकर जानवर था। कुछ डायनोसोर इतने बड़े थे जैसे तीन मंजिला मकान। 80-80, 90-90 फुट के ये जानवर चूंकि सरीसृप जाति के थे ये अंडे देते थे। इनके अंडे 12 से 20 फुट व्यास के फुटबाल नुमा पाये गये। ब्रेकियोसोरस विशालतम डायनोसोर था। इसकी लंबाई 90 फुट तक थी इसका सिर ही 36 फुट लंबा था।

यद्यपि ये सरीसृप प्रजाति के थे लेकिन ये जलचर से उभयचर फिर नभचर बने। प्रारम्भ में नभचरों के कंधों पर झिल्ली बनी होगी जिससे एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर कूदने में सहायता मिले और यही झिल्ली बढ़ते-बढ़ते पूर्ण पंख बन गये। पैट्रारनडोन सबसे विशाल नभचर था इसके एक डैने की लंबाई आठ फिट तक थी। इस प्रकार के पृथ्वी पर नभ, जल और थल पर अलग-अलग रूपों में विकसित होकर करोड़ों वर्ष तक राज्य करते रहे फिर एकाएक विलुप्त हो गये और फिर हिमयुग आया और सृष्टि संहार हुआ।

एक अरब वर्ष तक पृथ्वी पर बर्फ की चादर ढकी रही। मौसम ने रंग बदला और जीवन विकसित हुआ और इस बार स्तनपायी जीवों का विकास हुआ। मनुष्य इन्हीं का विकसित रूप है लेकिन करोड़ों वर्ष पुरानी पृथ्वी पर जीव जन्तुओं का ही साम्राज्य रहा है। मनुष्य तो केवल चालीस हजार साल पुराना है।


Monday, 25 August 2025

Brij ke Bhajan

 6कहन लागे मोहन मइया मइया 

नन्द राय जी को बाबा ही बाबा बलदाऊ जी सो भइया 

दूर खेलन मत जाओ प्यारे लनना मारेगी काहू की गैया 

सिंह पोरि चड़ टेरे यशोदा ले ले नाम कन्हैया 

मोर मुकुट मकरा कृत कुण्डल उर वन माल सुहैया 

मातु यशोदा करत आरति मैं मोहन की मइया 

छप्पन भोग छत्तीसो व्यजन व्यालू करलो कन्हैया 

आटो दूध दूध में मेवा पीलेऊ दोनों भइया 

खेलत फिरत सकल गोकुल में घर घर वजत वधैया 

ओरन के दुई चार ख्ेालत हैं मेरे तो एक कन्हैया 

मदन मोहन जी की छवि के ऊपर सूरदास वलि जैया 





77मुखड़ा क्या देखे दरपन में तेरे दया धर्म नही मन में 

जब तक फूल रही फूलवारी वास रही फूलन में 

एक दिन ऐसा आयेगा खाक उड़ेगी तन से मुखड़ा ...

चन्दन अगर कंुकुमी जामा सोहत गोरे तन में 

भय योवन डंगर का पानी उतर जाय एक दिन में ...

नदिया गहरी नाव पुरानी डूब जाय एक पल में 

धर्मी धर्मी पार उतर गये पापी अधवर में मुखड़ा....

कोड़ी कोड़ी माया जोड़ी सुरत लगी इस धुन में 

दस दरबाजे बन्द भये तब रह गई मन की मन में 

पगड़ी बाँधत पेच सभालत तेल मलत अंगन में 

कहत कबीर सुनो भई साधो यह क्या लगेगी रन में ...


78सर पे कदम की छैया मुरलिया बाज रही 

मेारी लाज रही 

राधा भी नाचे कन्हैया भी नाचे में भी नाचू नथैया भी नाचे 

नाचे नाचे आखें बोल बोल जैया मुरलिया ......

वंशी ने क्या धूम मचाई हर गोरी गोपी वन आई 

मुरली धर वन सैया मुरलिया बाज रही 

79अजब हैरान हूँ भगवन तुम्हें कैसे रिझाऊ मैं 

कोई वस्तु नही ऐसी जिसे सेवा में लाऊ मैं 

करू किस तरह आवाहन कि तुम मोजूद हो हर जा

निरादर है बुलाने में अगर घन्टी बजाऊ मैं 

लगाना भोग कुछ तुमको यह एक अपराध करना है 

खिलाता है जो सब जग को उसे कैसे खिलाऊँ मैं 

तुम्हारी ज्योति से रोशन है सूरज चाँद और तारे 

महा अन्धेर है भगवन अगर दीपक दिखाऊँ मैं 

भुजाये है न सीना है न गरदन है न पैशानी 

तू है निर्लेप नारायणा कहाँ चन्दन लगाऊ मैं 


80ब्रज राज श्याम सुन्दर दिल मंे समाय रहे है 

जित देखता हूँ मोहन मुझको दिखा रहे हैं

गुण जिनके सश्ी शारद नारद मुनी ने गाये

डमरू बजा बजा के शंकर जी गा रहे हैं 

ब्रज..........

गाते हैं गुणा सदा वो पर पार नही पावे 

है वह अजब खिलाड़ी संसार को खिला रह हैं 

ब्रज..........

है माया उनकी अदृभुत अरू है अजब मुरारी

अदृभुत है उनकी गीता अर्जुन जी गा रहे हैं 

ब्रज......................

गो द्विज को कट होता अरू धन क्षीरा होता 

प्रेमी समझ लें जन ही भगवान आ रहे हैं 

ब्रज..................................


81नर तन चोला रतन अमोला वृथा खोवे मतीना 

भई ये देह मिली तो है नर की जिसमें भक्ति करले तू हरि की 

सुध बुध मूल गया उस घर की नीद में सोवे मतीना .....

जो है पहले की सब करनी होगी यहाँ पर सबने मरनी 

ऋषी मुनियों ने ऐसी वरनी विपद में रेवे मतीना 

देखे ऋाि मुनी फफ्कर से फँस गये माया के चक्कर में 

किश्ती आन पड़ी टक्कर में इसे डुबोब मतीना 

कमर सिंह बाँध कमर हो तगड़ा यह तो व्यर्थ का मूढा झगड़ा 

सीधा पड़ा मुक्ति का दगड़ा कायर रोने मतीना 


82चले श्याम सुन्दर से मिलने सुदामा जाते चलो मन में हरे कृणा रामा 

चावलों की पोटली बगल में दबाये हाथों में लोटा और डोरी लटकाये

चले विप्र पहुँच गये द्वारका पुरी धामा गाते .......

द्वार पाल से खबर जनाई हरि मिलने को सुदामा जी आये

दौड़े हरि गले से लगाये सुदामा गाते ............

सोने के सिहासन पे विप्र को बैठाये नैनों के नीरो से चरणा धुलाये 

दावे हरी पाँव पंखा भले सत्य माया गाते ..............

हसि हसि पूछे कुवर कन्हाई क्या भेट भेजी है मेरी भोजाई 

छीन प्रभु पोटली तो सकुचे सुदामा गाते ................

तन्दुल के खाये प्रभु दिये धन धाना गाते ..........................

एक मुट्टी खाय प्रभु एक तुने ही दीन्ही हू


Tuesday, 19 August 2025

Kya aap jante hain

 क्या आप जानते हैं?


इन्सान के जन्म से शरीर के सभी अंगों का विकास होता है सिवाय ऑंखों के 


बाज और गिध्द की ऑंख बहुत चमकदार होती है,और एक नजर में दूर दूर की चीजें देख लेती हैं ।

जो मछलियॉं अंधेरे गहरे समुद्र में रहती हैं उनकी आंखें ज्यादा विकसित और बड़ी होती हैं,ये मछलियॉं अंधेरे गहरे समुद्र में  विचरण करने वाले जीवों को आसानी से देख लेती हैं ।5000 फुट की गहराई वाली मछली की आंखें चमड़ी की  परत से  ढकी रहती हैं ।कुछ मछलियों की आंखें दो हिस्सों में वृताकार होती  हैं जब वे पानी की सतह पर होती हैं तो ऊपर का  हिस्सा काम करता है जब पानी के नीचे होती हैं तब निचला हिस्सा काम करता है ।



जिस वाहन को हम आज जीप नाम से जानते हैं उसे पहले  जनरल पर्पस व्हिहीकल कहते थे फिर इसका संक्षिप्त रूप ‘ जी.पी.’ चलन में आया और सिमटते सिमटते यह जीप बन गया ।


चिंपेंजी का  नाम  कैसे पड़ा? एक अफ्रीकी व्यक्ति ने दो वनमानुष पाल रखे थे एक का नाम उसने चिप और दूसरे का पैंजी, उन्हें वह एक साथ बुलाता तो  चिपैंजी ही बुलाता था और इस तरह उस जीव का नाम  चिंपैजी पड़ गया ।


 नायलान की खोज न्यूयार्क और लंदन में एक समय हुई थी । इन दोनों नगरों के नाम के प्रारम्भिक अक्षरों नाय और लन को मिलाकर नायलॉन की कल्पना की गई थी ।

 कंगारू के नामकरण की भी अजीब कहानी है ।1773 ईस्वी में प्रसिध्द यात्री ‘कैप्टन कुक’ आस्टेलिया में थे तब उनके कुछ साथी एक विचित्र जीव को पकड़ लाये  जिसे पहले कभी नहीं देखा था। एक स्थानीय निवासीसे उसका नाम पूछा उसने अपनी भाषा में कहा ‘कंगारू’ जिसका  अर्थ था ‘मै नहीं जानता ’पर उन्होंने समझा कि इस जीव का नाम  ही कंगारू है और तभी से  यह नाम  चलने  लगा ।



ताश की गड्डी में पान के बादशाह और ईंट के  गुलाम के मूंछें नहीं होती ।


Saturday, 16 August 2025

Brij ke Bhajan

 71मेरे माठी के मटके तू राम राम बोल

उपर से तू चिकना चुपड़ा भीतर से है तेरा पोल मेरे .....

उपर से तू सुन्दर बहुत है भीतर पड़ा है विष घोल मेरे 

जब तू जायेगा यम के द्वारे तब ही खुलेगी तेरी पोल मेरे 

लख चोरासी में फिर आया अपनी हस्ती टटोल मेरे ....

कहत कबीर सुनो भई साधों राम का नाम अनमोल

मेरे माटी के मटके तू राम नाम बोल 


72तेरी बन जैहे गोविन्द गुन गाये से 

गोविन्द गुन गाये से गोपाल गुन गाये से 

शबरी की वन गई अजामील की बन गई 

गणिाका की बन गई सुग्गा के पढ़ाये से 

धु्रब की भी बन गई प्रहलादो की बन गई 

मीरा की बन गई जहर विष खाये से 

कबिरा की बन गई सूरो की बन गई 

तुलसी की वन गई राम गुन गाये से 


73जुलम कर डारोरी या काली कमली वाले ने 

मथुरा में याने जन्म लियो गोकुल में बजे बधाये जी या 

सोय गये याके पहरे वाले आपहि खुल गये तालेरी या 

ले वसुदेव चले गोकुल को यमुना ने चरणा परवारे जी 

कर श्रंगार पूतना आई माके छिन में प्रान निकाले री या 

इन्द्र ने कोप कियो ब्रज उपर नख पर गिरवर धारे री या 

चन्द्र सखी मज वाल मोहन छवि हरि भक्त प्राणा उधारे री 


74बासुरिया कहाँ भूल आये कान्हा निरमोइया 

आगे आगे चले कन्हैया पीछे दाउ भइया 

उनके पीछे चले मनसुखा उनके पीछे गइया 

माखन चोर नन्द को ढोटा कहती चले गुजरिया 

मारग में नहीं जाने देव डाले फोर गगरिया 

रास रचावे वंशी तटपर नाचे ताता थैया 

राधा के संग में बृज वाला हो रही ता ता थैया 

लेकर चीर कदम्ब पर बैठे संग बलदाऊ भैया 

हाथ जोड़ कर गोपी बोली विनती सुनो कन्हैया 

बृज को छोड़ द्वारका धाये ऐसे निठुर कन्हैया 

सूना वृन्दावन दिखावे व्याकुल ग्वालिन भइया 

राधा गोपी रूदन मचावे ग्वालिन मनसुखा भइया 

बृज वासन वागन में रोवे ले ले नाम कन्हेया 

75मेरी फूल बगिया चको महाराज

तेरी फूल बगिया में क्या क्या लगा है बेला चमेली गुलाव 

तेरी फूल बगिया में क्या क्या विकत है पूरी कचोड़ी अचार 

तेरी फूल बगिया में क्या क्या वजत है ढोलक मंजीरा सितार 

तेरी फूल बगिया में कोन बसत है राम लखन हनुमान 

चन्द्र सखी भज बाल कृणा छवि रघुवर देखो निहार 


Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...