Wednesday, 17 July 2024

Bhajan 11

 ☺24

मैं डूबा उस पार मोहन पार करो

और नहीं आधार मेाहन पार करो

झिमिरी नइया डगमग डोली 

कर्ण धार की है मति डोली

लेकर अब पतवार मोहन पार करो 

कौन नाथ तुम सम उपकारी 

करते सदा दीन रखवारी 

कर थोड़ा उपकार मोहन पार करो

रघुनन्दन आ वेग बचाओ 

करूणा निधि करूणा कर आओ 

कठिन बीच परिवार मेाहन पार करो


25☺

                      कृष्णा घर नन्द के आये सितारा हो तो ऐसा हो 

करे सब प्रेम से दर्शन दुलारा हो तो ऐसा हो 

बकासुर को मसल डाला पूतना जान से मारी 

कंस को केश से खीचां खिलारा हो तो ऐसा हो 

कूद पानी के अंन्दर से नाग को नाथकर लाये 

चरण फण फण पे घर कर के नचारा हो तो ऐसा हो 

तीर जमुना के जाकर के बजाई बांसुरी मोहन 

चली घर छोड़ ब्रज नारी पियारा हो तो ऐसा हो 

रचाया रास कुंजन में मनोहर रूप बन करके 

देव दर्शन को चले आये दिदारा हो तो ऐसा हो 

गये जब छोड़ गोकुल को नहीं फिर लौटकर आये 

सखी रोती रही वन में किनारा हो तो ऐसा हो 

पुरी द्वारावती जाकर महल सोने के बनवाये 

हजारों रानियाँ ब्याही पंसारा होतो ऐसा हो 

कुरू पाँडव लड़े रण में जीत अर्जुन की करवाई 

बचाई लाज द्रोपदी की सहारा हो तो ऐसा हो 

उतारा भार भूमि का सिधाये धाम अपने को 

वो ब्रह्नाा नन्द दुनिया का नियारा हो तो ऐसा हो 






26☺

श्यामाश्याम सलोनी सूरत कौ श्रंगार बसन्ती है 

मेार मुकुट की लटक बसन्ती चन्द्र कला की चटक बसन्ती

मुख मुरली की मटक बसन्ती

सिर पर पेच श्रवण में कुण्डल की छविदार बसन्ती है 

श्यामा श्याम ...............

माथे चन्द्र लस्यो बसन्ती कटि पीताम्बर कस्यो बसन्ती

मो मन मोहन बसो बसन्ती

गुंज माल गल सोहे फूलन को गल हार बसन्ती है 

कनक कडूला हस्त बसन्ती चले चाल अल मस्त बसन्ती

पहर रहे पोशाक बसन्ती

रूनुक झुनुक पग नपुर की झनकार बसन्ती है 

सग ग्वालन के गोल बसन्ती बेाल रहे हैं बोल बसन्ती

बजे चंग ढप ढोल बसन्ती 

सब सखियन में राधे जी सरदार बसन्ती है 

परम प्रेम परशाद बसन्ती लगे चसीलो स्वाद बसन्ती

है रही सब भरजाद बसन्ती

धासी राम श्याम श्यामल कोै नाम बसन्ती है 




27☺

                       सखी घनश्याम राधे में लड़ाई होने वाली है

बहुत दिन की मुहब्बत है जुदाई होने वाली है

न हसँती बोलती राधे न करती बात मोहन की 

न मालुम किस तरह ऐसी बुराई होने वाली है

                    मिले कल कुंज में ये श्याम बहुत मिन्नत खुशामद की

न मानी लाड़ली राधे रुखाई होने वाली है

मुरारी से हुआ अपराध ऐसा कौन सा आली 

प्रिया प्यारे दोनों में सफाई होने वाली है

वहाँ उनको न कल उन बिन 

                        न उनको चैन था उन विन 

क्यों राधे श्याम पंिडत की रसाई होने वाली है



28☺

हमारे श्याम सुन्दर भी अजब माया दिखाते हैं

किसी को पल में करते खुश किसी को जा रुलाते हैं

मदारी खेल जो करता बजाकर कर डुग डुगी अपनी 

उसी की भाँति मोहन भी जगत को जा नचाते हैं

मुरारी भक्तों के कारण अनेकांे रूप धरते हैं

दुर्योधन मेवा तज बिदुर घर साग खाते हैं

सदा से प्रेमी के मोहन सदा मोहन के प्रेमी हैं

वो प्रेमी प्रेम से रीझे अजब बंशी बजाते हैं

सखा अर्जुन को उनके जब कि रण में मोह होता है

तो रथ पर बैठकर वो प्रेम से गीता सुनाते हैं


29☺

यह तो बताओ भगवान कैसे जपू नाम तेरा 

काहे की नाव काहे के खेवा काहे से उतर जाय पारा

सत्य की नाव धर्म को है ख्ेावा करनी से उतर जाय पारा

काहे की धरती काहे का है अम्बर काहे का बना संसारा

सत्य की धरती धर्म का है अम्बर मतलब का है संसारा

सिर की जटा खोले डोलू मैं बन वन तोऊ न मिले नन्द लाला 

कहत कबीर सुनो भई साधो भजन से मिले नन्द लाला 

ऐसो जपो नाम तोरा 











30☺

मोहन हमारे मधुवन में तुम आया न करो

जादू भरी ये बाँसुरी बजाया न करो 

छलिये आया न करो

सूरत तुम्हारी देख कर सलोनी साँवरी 

सुनकर तुम्हारी बासुँरी होती हूँ बाबरी

इस बासुँरी पर टेर ये सुनाया न करो 

जादू भरी ......................

सिर पर मुकुट गलमाल कटि में काछनी सोहे

कानों में कुण्डल झूमते मन को मोरे मोहे

यो चन्द्रमा का रूप ले लुभाया न करो 

जादू .....................

अपनी यशोदा मइया की सौगन्ध है तुमको 

माखन चुराने वाले चित चुराया न करो 

जादू ............................

                         ☺ 31

चीर आकर बढ़ा पापी खींचे खड़ा है मुरारी 

भरी सभा में है करता उधारी

जुल्म करता सितम आज भारी 

                        दुष्ट दुशासन है अत्याचारी

है ये पापी भला काट इसका गला विपदा भारी 

भरी सभा में है करता उधारी 

बैठे पाँडव सभी नार डाले 

                       कोई ऐसा न मुझको बचाले 

मेरी बिगड़ी बना करदे पापी फना क्या बिचारी 

भरी सभा में है करता उधारी 

सामने आज विपदा खड़ी है 

                        वधिक के फन्दे में मृगनी पड़ी है

पार नइया करो भार आकर हरो 

                        शरण तुम्हारी भरी सभा ..........................

श्याम सृष्टि के तुम हो रचैया 

                        नाव जनकी हो तुम्ही खिवैया 

फरियाद भक्त करंे विनती निशदिन करे 

                        जनता सारी भरी सभा ..........................





Tuesday, 16 July 2024

Bhajan 10

 ☺देवी जी 

महिमा तुम्हारी है निराली जगदम्बे मइया 

तेरे सहारे चलती है नइया तेरे सहारे जीते है मइया 

सबकी मिटा दो रात काली जग ....

धूप दीप नैवेध आरती ये ले लो पूजा की थाली 

कंचन थार कपूर की बाती ये लेलो आरती की थाली 

छप्पन भोग छत्तीसों व्यंजन ये ले लो भोजन की थाली 

कब से खड़ी हूँ मइया आस लगाये पूूजा हमारी खाली न जाय 

इच्छा कर देना भरपूरी जगदम्बे ..........

दुखियों के घर में सुख बरसादो अंधियारे घर में दीपक जला दो 

तुमसे ही घर घर में दीवाली जगदम्बे 


☺द्वारे तुम्हारे बड़ी भीड़ जगदम्बे मइया 

द्वारे तुम्हारे एक अबला पुकारे 

अन्धे को नैना दे देना जगदम्बे भइया 

द्वारे तुम्हारे एक कोढ़ी पुकारे 

कोढ़ी को काया दे देना जगदम्बे मइया 

वाझिन .......................बालक 

कन्या ..........................घर वर 

बालक .....................बुद्वि

भक्त .............................दरशन दे देना जगदम्बे मइया 

माता मोहे राज बता दो 

सरस्वती शीश को आज्ञा दो मात मैं शीश नवाऊँगी 

सरस्वती नेनाैं को आज्ञा दो मात मैं दरश करूँगी 

सरस्वती कानन को आज्ञा दो मात मैं कथा सुनूॅंगी

सरस्वती देह को आज्ञा दो मात में गंगा नहाऊँगी 

सरस्वती हाथन को आज्ञा दो मात में दान करूॅंगी

सरस्वती पावों को आज्ञा दो मात परिकम्मा करूँगी 

सरस्वती में सुमरू बारम्बार मात मोहे ज्ञान सिखा दो 


 


☺संतोषी माँ संतोषी माँ मैं कब से तुम्हें पुकार रही

तेरे द्वार खड़ी एक दुखियारी आशा से तुम्हें निहार रही 

मेरे हाथ नहीं है गंगाजल जो तुम्हें नहलाने आ जाती 

आँखों के अश्रु से मइया में तुम्हें नहलाने आई हूँ

मेरे हाथ नहीं है फूलांे के हार जो तुम्हें पहनाने आ जाती 

लेके फूलों को माता में तुम्हें चढ़ाने आई हूँ 

मेरे पास नही मेवा मिश्री जो भोग लगाने आ जाती 

मेरे पास धूप और बाती नही जो आरती करने आ जाती 

ह्नदय के भावों को मइया मै तुम्हें दिखाने आई हूँ

माँगू माँगू तो क्या माँगू मेरे पास है सब कुछ क्या माँगू 

माँगू तो फिर में यह माँगू मेरी बिगड़ी बात बना देना 


☺ तेरो मुख चन्द्र चकोर मेरी माता 

देवि के द्वारे एक कोढ़ी पुकारे 

उसका दुख दूर करो मेरी माता 

तेरो ..................

माता के द्वारे एक बाझन पुकारे 

उसको लालन दे ओ मेरी माता 

तेरा ................

माता के द्वारे एक दुखी पुकारे 

उसका दुख दूर करो मेरी माता 

                        दासी की विनती सुन मेरी माता

चरणा कमल में मेरो मन राता 

तेरो ..............................

मइया बैठी है सिंहासन माला खड़ा लिये माली 

सिर मइया के मुकुट विराजे माथे बिंदिया भारी 

नाक मइया के नथुनी सोहे होठों पर सोहे लाली

कान मइया के कुण्डल सोहे गले में हरवा भारी 

हाथ मइया के कंगन सोहे गोटा जरद किनारी 

पैर मइया के पायल सोहे महावर की लाली 

मइया ..................

हाथ में मइया के खप्पर सोहे एक हाथ भुजाली 

सिंह पर मइया गरजत आवे लंागुर करे अगवानाी 

मइया ............................................


☺बधाई बाजे मइया तोरे भवन में 

सिर पर मुकुट माथे पे बिंदिया 

कजरा सोहे मइया तोरे नयन में 

बधाई .................

मुँह में पान हाथ में मेंहदी 

जड़े हीरा मइया तोरे कंगन में 

बधाई .............................

गोटा जरी लागे तोरे लहँगा में 

सितारे लागे मइया तोरे चुनर में बधाई 

पाव महावर विछवा सोहे 

पायल बाजे मइया तोरे चरन में बधाई 

हंसि पूछे श्री भगवान शारदा के बहिनी 

एक बहिनी कलकत्ता विराजे

जिसका कालका नाम शारदा के बहिनी 

एक बहिनी बम्बई में विराजे 

जिसका मुम्वा नाम शारदा के बहिनी 

एक बहिनी कानपुर में विराजे

जिसका तपेश्वरी नाम शारदा के बहिनी 

एक बहिनी वख्शी ताल विराजे

जिसका चंद्रिका नाम शारदा के बहिनी 

एक बहिनी लखनऊ में विराजे

जिसका शीतला नाम शारदा के बहिनी 

एक बहिनी नीम सार विराजे 

जिनका लालता नाम शारदा के वहिनी 


☺मंाग्यो वरदान देवी के मन्दिरवा भीतर 

माग्यो मैं अन्न धन सोनवा 

बरसे अनुराग देवी के मन्दिरवा भीतर 

माग्यो मैं चटक चुनरिया 

लागे नही दाग देवी के मन्दिरवा भीतर 

मंाग्यो मैं भर हाथ चुड़ियां 

                        मोरे अमर सुहाग देवी के मन्दिरवा भीतर

भाग्यो मै पति की उमरिया दमके मोरी माँग 

देवी के ..............................................

भाग्यो मे एक दुई लरिका कन्या अकेली देवी के 

अम्बे कहा जाय जगदम्बे कहा जाय

बोल अम्बे रानी तुझे क्या कहा जाय 

मैने सोने का वेंदा बनवाया उसमें हीरे और मोती जड़वाया 

तुम्हें फूलों का हॉं तुम्हें फूलों का बेंदा पसद आया 

अम्बे ..................................

मैने सोने के कुन्डल बनवाये उसमें हीरे और मोती जड़वाया 

तुम्हें फूलों के हाँ तुम्हें फूलों के कुण्डल पसन्द आये 

अम्बे ...........................

मैने सोने का हार बनवाया उसमें हीरे और मोती जड़वाया 

तुम्हें फूलों के हाँ तुम्हे फूलों के हार पसन्द आये 

अम्बे ......................................

मैने सोने की तगड़ी बनवाई उसमें हीरे ओर मोती जड़वाये 

तुम्हें फूलों की हाँ तुम्हें फूलों की तगड़ी पसन्द आई 

अम्बे .........................

मैने सोने के विछुये बनवाये उसमें हीरे और मोती जड़वाये

तुम्हें फूलों के हाँ तुम्हें फूलों के बिछुये पसन्द आये 

अम्बे .....................................

मैने गोटे की चुदरी बनवाई उसमें मोती की झालर लगवाई 

तुम्हें लाल चुदरिया पसन्द लाल चुदरिया पसन्द आई ।


आजाओ मेरी संतोषी माँ सिहासन तेरा खाली है 

मइया एक अरज मेरी सुन लेना 

मेरा माथे का संेदुर अमर करना 

वह हँस कर बोली बेटी पूरी तेरी आशा आजाओ

बिन्दीनथुनी चूड़ी मेंहदी बिछुये चुन्दरी 


Monday, 15 July 2024

Bhajan 9

 

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Bhajan 6

 ☺18

मैया कर दे मेरो ब्याह मंगायदे दुलहिन गोरी सी 

गोरी सी गुनवारी होय भोरी सी बिचारी होय

गोरी नथवारी होय बड़े गोप की लली

ढूँढ दै री माय जामें तेरो कहा जाय 

झट दूल्हा मोय बनाय बात मान लै भली

छोटे हाथन बीच रचायदे मेंहदी थोडी सी मैया कर दे ..........................

थोड़ी सी बरात ग्वाल बाल पाँच सात 

मल हल्दी से हाथ रेशमी पिताम्बर 

बँधाय कर कुल की रीत गोपी गाय देगी गीत 

और दैदे पट पीत शीश सहरा धराय 

धर मुकुट वियहिवेे जाऊॅं कछाय दे कछनी कोरी सी मैया ......................

कोरी मैया करे बात बुरौ बलदाऊ मेरौ भ्रात

ले न जाऊगो बरात रहे मोसे दूर दूर 

कबहू न राखे मेल जाते बिगरौ सिमरो खेल

मेल राखे न कबहू बाकू मोय कहे तू

जा दिनते घर पाये काहू की छोटी मोरी सी मैया ..................

मैया ऐसे ढुंढवाय गोदी में ले बैठाय रूठ जाय ले मनाय मैरो ब्याह करे 

होले होले आय बतराय आवे बातन में रस बाबा नन्द से बताय 

प्रीति बढे मेरी चन्द्र चकोरी सी मैया कर दे ..................



☺19

माई ये मनमोहन के साथ ग्वालन के गये दधि खाने को 

घुसे एक गुजरी के घर में ग्वाल सहित गोपाल 

गोरस की छींके पर मटकी लटकी देख विशाल  

लगे सोचन राह जतन की गुणी हर फन के गये दधि खाने को 

नाँद पे खड़ा किया ग्वाले को ता कांधे चढ़ श्याम 

फिर भी ना पाया मटकी को तो किया अनोखा काम 

मारा है लोटा हन के चतुर बचपन के गये दधि खाने को 

पेंदा फोड़ दिया मटकी का बही दूध की धार 

वारी वारी लगा के चुल्लू पीवे बाल गुपाल

पूरे परन हुये मन के ग्वाल बालन के गये दधि खाने को 

ता विच गोरस बेच के गुजरी आई अपने धाम 

ग्वाल बाल छिप गये तुरत और पकड़ गये घनश्याम 

मन में बसे है गोपिन के नाथ भक्तन के गये दधि खाने 



☺20

सखी री मैने गोविन्द लै लिये मोल 

काहे की डन्डी काहे का है पलरा काहे से ले लियो मोल 

सखी री .....................................

मोहन की डन्डी ऑंखन का है पलरा ह्नदय से ले लियो मोल 

सखी री ................................

कोई कहे गोरो कोई कहे कारो कोई कहे चित चोर 

सखी री .....................................

कोई कहे रूपया कोई कहे पैसा श्याम लियो अनमोल 

वृन्दावन की कुंज गलिन पे मिल गयो नन्द किशोर 




राधे श्याम से आज मिला दो मुझे

सेवा कुंज की राह बता दो मुझे

है यही अभिलाषा श्यामा श्याम के दरशन करूँ

जाऊँ शरण वारिज प्रभु की चरण रज मस्तक धरूँ

कोई सीधी सी राह बता दो मुझे राध्ेाश्याम .............

..बेला या द्रुम भुला मधुकर फूल फल अली बनू

सींचू नैन जल से कुसुम कानन विपिन माली बनूँ

भानु तनया का नीर पिलादो मुझे राधे श्याम .....................

जमुना किनारा पास हो और शरद रैन प्रकाश हो 

आस पूरन हो जभी वृन्दा विपिन में वास हो 

भूमि कि रेशा बना दो मुझे राधे श्याम ................................

या बना मकरन्द मृदु माला मनोहर कुंज की 

कोई तो वस्तु बना दे श्री राधा केलि निकुंज की 

कहीं चित्र समझ के लगा दो मुझे राधे श्याम ..................

भूप ब्रज के रूप रस की वारणी पिया करूँ

झाँकी जुगल बाँकी अदा की सर्वदा किया करूॅं

श्याम वंशी की तान सुना दे मुझे राधे श्याम से ..........................






21

मइया जब मैं घर से चलंू बुलावे ग्वालिन घर में होय 

अचक हाथ को झालो दे के मीठी बोली देवर कह के 

निधरक है जाय सॉकर देके झपट उतारे काछनी मुरली लेत छिनाय 

मैं बालक यह धीगरी मेरो बस न चलाय आपहु नाचे मेाहि नचावे कहा बताऊं तोय 

मइया जब ..................................

मैं भोरो यह चतुर गुजरिया एक दिन ले गई पकड़ उंगलिया 

 टूटी सी जाकी राम कुठरिया धरी मटुकिया मो निकट गोरस की तत्काल      माखन दूंगी घनों सौ जो चेंटी बीनो लाल मैने या की चेंटी बीनी यह निधरक रही सोय मइया जब ..............................

एक दिना पनघट पर मइया  मैं बैठो एक द्रुम की छैया 

ढिंग बैठो बलदाऊ भइया यह ले पहुँची गगरिया सो रपटो जाको पाय 

मेरे गोहन पड़ गई कि धक्का दीनो श्याम गुलचा दे दे लाल गाल किये मैं ठाड़ो रहो रोय मइया जब ...............................

हमें दिखावत हो ठकुराई नन्द बाबा की गाय चराई घर ही में बढि रहे कन्हाई 

तनिक छाछ पर नाच दिखावो कहा सिखावो मोय मइया जब .....................................

भक्तन हित यह देह हमारी  तू कहा जाने जाति की ग्वारी 

बन्शी तीन लोक से न्यारी श्रवण सुनत सुर नर मुनि मोहे जल थल नाद समाय 

मइया जब ..........................


Sunday, 14 July 2024

Bhajan

 

10

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Sunday, 7 July 2024

tenduye ki khoj main shikar

 

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Tuesday, 2 July 2024

Rip Van Winkle

 

Rip Van Winkle

At the foot of koatskill mountain there was a village. There were the houses of the orignal settlers, of Small yellow bricks brought from having latticed windows and gabled fronts surmounted with weather cocks.

          In one of these house there lived a very simple good natured fellow of  name Rip Van Winkle.          He was great favrouite in the village . The children of the village would shout with joy whevever he appooached.He assisted  at their sports made there playthings, taught them to fly kites and shoot marbles and told them long stories of Ghosts, and wiches.

          The great error in Rip’s compostion was an insuperable aversion to all kinds of profitable laboura. Rip was ready to attend to any body’s business but his own but as to any body business duty and keeping his form in order he found it impossible.

          In fact he declared it was of no use to work on his farm his fences were continually falling to pieces ; his cow would either go astray or get among the cabbaqes His children too were as ragged as and wild as if they beloned to nobody.

          His wife kept continually dinning in his ears about his idleness his careless ness and the ruin he brought for his family. Morning, noon and night her tounge was incessantly going and every thing he said was or did was sure to produces a torrent household  eloquence.

          Rip’s sole domestic adherent was his dog  wolf who was as much henpecked as his master.

          Time Grew worse and worse with Rip Van Winkle when driven from home Rip used to sit with philosophers, and other idle personaqes of the village held it session on a bench before a small inn to eseape from th labaour of the farm and clamor of his wife with his gun stroll away in to the woods. Here he would sometimes seat himself at the foot of a tree and share the contents of his wallct with wolf.

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